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लेख - November 7, 2022

इस्राइल में नेतन्याहू का पुनरोदय

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

इस दौरान इस्राइल में जितनी फुर्ती से सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं, दुनिया के किसी अन्य लोकतंत्र में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलते। बेंजामिन नेतन्याहू लगभग डेढ़ साल बाद फिर दुबारा प्रधानमंत्री बन गए। उनका यह पुनरोदय असाधारण हैं। वे इस्राइल के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो वहीं पैदा हुए हैं। उनसे पहले जो भी प्रधानमंत्री बने हैं, वे बाहर के किन्हीं देशों से आए हुए थे। जब 1948 में इस्राइल का जन्म हुआ था, तब जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका आदि कई देशों के गोरे यहूदी लोग वहां आकर बस गए थे। उन्हीं में से एक का बेटा जो 1949 में जन्मा था, अब इस्राइल का ऐसा प्रधानमंत्री है, जिससे ज्यादा लंबे काल तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा। 47 साल की उम्र में इस्राइल के प्रधानमंत्री बननेवाले वे सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। वे कई बार हारे और जीते। उन्हें दक्षिणपंथी माना जाता है। वे फौज के सिपाही होने के नाते 1967 के अरब-इस्राइल युद्ध में अपनी बहादुरी दिखा चुके थे। यह वह वक्त था, जब इस्राइल ने डंडे के जोर पर सीरिया से गोलान की पहाड़ियां, जोर्डन का पश्चिमी किनारा, गाजा पट्टी और पूर्वी यरूशलम पर कब्जा कर लिया था। उस आक्रामक संस्कार से मंडित नेतन्याहू ने जब इस्राइली राजनीति में प्रवेश किया तो वे अरब-विरोधियों के प्रवक्ता बन गए। नरमपंथी प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की हत्या के बाद 1996 में हुए चुनाव में इस्राइल की जनता ने घनघोर अरब-विरोधी नेतन्याहू को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। नेतन्याहू उस ‘ओस्लो एकाॅर्ड’ के विरोधी थे, जो इस्राइल और फलिस्तीन के दो राज्यों को मान्यता दे रहा था। दो राज्यों का यह समाधान आतंकवाद की भेंट चढ़ गया और नेतन्याहू ने उस समझौते की धुर्रियां बिखेर दीं। उन्होंने इस्राइल द्वारा कब्जाए गए इलाकों को खाली करने से मना कर दिया, अरबों को इस्राइल से निकाल बाहर करने की मुहिम चलाई और फलिस्तनियों से समझौते के सारे रास्ते बंद कर दिए। नेतन्याहू ने अमेरिका से नजदीकी बढ़ाई और ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान छेड़ दिया। उन्होंने ओबामा-काल में ईरान के साथ हुए परमाणु-समझौते का विरोध किया और ईरान के विरुद्ध परमाणु शस्त्रास्त्रों के प्रयोग की धमकी भी दी। उनके ईरान-विरोध ने अरब देशों के सुन्नी शासकों को इस्राइल के नजदीक ला दिया। अब इस्राइल के मिस्र, सउदी अरब, जोर्डन, यूएई, बहरीन, मोरक्को, सूडान आदि राष्ट्रों से भी ठीक-ठाक संबंध बन गए हैं। भारत और रूस के साथ भी इस्राइल के संबंध पहले से बेहतर बनाने में नेतन्याहू का विशेष योगदान है। उन्हीं के प्रयत्न के फलस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस्राइल गए थे और वे खुद दो बार भारत आ चुके हैं। भारत के साथ इस्राइल के सामरिक, व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध पहले से भी ज्यादा घनिष्ट होने की संभावना है लेकिन फलस्तीन का मामला अब ज्यादा उलझ सकता है, क्योंकि नेतन्याहू की सरकार में यहूदी उग्रवाद के प्रवक्ता भी शामिल हैं।

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