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लेख - July 26, 2022

गरीबों, बुजुर्गों और किसानों की रेवड़ी, पूंजीपतियों को

-सनत जैन-

-: ऐजेंसी/अशोक एक्सप्रेस :-

सरकार ने रेलवे की टिकट में बुजुर्गों को 50 फ़ीसदी की जो छूट दी जा रही थी। उस छूट को आगे जारी रखने में असमर्थता जाहिर की है। सरकारी खजाने की खस्ता हालत का वास्ता देकर बुजुर्गों की रेलवे टिकट में दी जा रही छूट को सरकार ने समाप्त कर दिया है। पिछले वर्षों में रेलवे ने शुल्को के नाम पर रेलवे की टिकट राशि को काफी बढ़ा दिया है। कोविड-19 के बाद काफी सुविधाएं बंद कर दी गई हैं। दूसरी ओर बुजुर्गों पत्रकारों एवं अन्य वर्ग को रियायत भी बंद कर दी है। गरीवों को मिलने वाली गैस, खाद, डीजल, सहित दर्जनों सब्सिडी पहिले ही खत्म कर दी गई है। देशभर में इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हो रही है। प्रशासनिक हल्कों में यह भी चर्चा है कि रेल्वे की निजीकरण की तैयारी में पूंजीपतियों के लिये रास्ता साफ करने और सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए रेल्वे की रियायतें को खत्म कर रही है।
सरकार ने जो जानकारी दी है। उसके अनुसार वर्ष 2017-18 के वित्तीय वर्ष में 1491 करोड़, 2018-19 के वित्तीय वर्ष में 1636 करोड और 2019-20 के वित्तीय वर्ष में 1664 करोड रुपए की रेलवे ने बुजुर्गों को रियायत दी थी। सरकार ने वित्तीय स्थिति को देखते हुए यह छूट बंद कर दी है। जिसके कारण बुजुर्ग अब रेलवे में रियायती दरों पर यात्रा नहीं कर पाएंगे। सरकार के इस निर्णय की आलोचना हो रही है। यह कहा जा रहा है गरीबों, बुजुर्गों और किसानों को दी जाने वाली सहायता को केंद्र सरकार द्वारा रेवड़ी बताया जा रहा है। वहीं सरकार पूंजीपतियों को रेवड़ी की जगह झोला भर भर के मिठाई खिला रही है। बुजुर्गों को 3 वित्तीय वर्ष में रेलवे द्वारा मात्र 4791 करोड रुपए की रियायत दी गई है। वही पूंजी पतियों का केवल स्टेट बैंक से 14लाख 5हजार 248 करोड़ रुपए के ऋण माफ कर दिए गए हैं।
3 साल में स्टेट बैंक ने किए राइट ऑफ वर्ष 2017-18 के वित्तीय वर्ष में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने 17548 करोड, वर्ष 2018-19 में 27225 करोड़ तथा 2019-20 में 40348 करोड रुपए के विलफुल डिफॉल्टर उद्योगपतियों के लोन को बट्टे खाते में डाल दिया गया। पूंजीपतियों के 3 वर्ष में 91121 करोड़ रुपए स्टेट बैंक ने माफ कर दिए। सरकार की पूंजीपतियों पर की गई यह कृपा, सरकार की गरीबों और जरूरतमंदों के बारे में सोच को उजागर करती है। जनता का पैसा अब जनता के लिए रेवड़ी बन गया है। वहीं बैंकों मैं बचत और टैक्स के रूप में, सरकारी खजाने की जमा रकम को पूंजीपतियों में बांटने की देश में अब बड़ी प्रतिक्रिया होने लगी है।
पिछले वर्षों में जिस तरह से सार्वजनिक उपक्रमों को ओने पौने दामों में कारपोरेट को लीज पर या हिस्सेदारी देकर,सरकार पूंजीपतियों को जनता का धन मुक्त हस्त से बांट रही है। बैंकों से भी पूंजीपतियों के लिए हजारों लाखों करोड़ रुपयों के ऋण उपलब्ध कराकर और बाद में उन्हें राइट ऑफ कराकर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की नीति से आम आदमी में हताशा और निराशा देखने को मिलने लगी है। 2018 से 2022 के 4 सालों में सरकार ने पूंजीपतियों के 8 लाख 53 हजार करोड रुपए के ऋण बट्टे खाते में डाल दिए। वहीं रेलवे मैं बुजुर्गों को 1700 करोड़ रुपए सलाना की जो रियायत दी जा रही थी। वह बंद कर सरकार ने अपनी प्राथमिकता बता दी है।
पिछले वर्षों में सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ, सार्वजनिक उपक्रमों, रेलवे के निजीकरण के निर्णय ने उद्योगपतियों के लिए कमाई के नए-नए संसाधन उपलब्ध करा दिए हैँ। पूंजीपति पानी बेचने से लेकर, टोल टैक्स, बैंकों के शुल्क, सिंचाई, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के निजी करण के माध्यम से एकाधिकार के बल पर बड़ी कमाई कर रहे हैं। आम आदमियों को पूजी पतियों के मनमानी शर्तों और मनमाने दामों पर सामान तथा सेवाएं लेने विवश कर दिया है। वहीं आम आदमी जो गरीब और मध्यम वर्ग का है। जिसकी आमदनी बहुत सीमित है। उसके ऊपर लगातार टेक्स और विभिन्न शुल्क का ऐसा मकड़जाल केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने बना दिया है। जिसमें फंसकर आम आदमी फड़फड़ा रहा है। खाद्यान्न, फल, दूध और सब्जी, खुदरा व्यापार का धंधा कारपोरेट जगत को देने, श्रम कानूनों में परिवर्तन करके उद्योगपतियों के लिए कम मूल्य पर ज्यादा काम कराने का कानून बनाकर पूंजीपतियों के हित मे सरकार काम कर रही है। वहीं भारत के असंगठित क्षेत्र का व्यापार खेती, किसानी एवं विभिन्न सेवाएं सुनियोजित रुप से कानून बनाकर उद्योग पतियों को सौंपी जा रही हैं। जिससे सबसे बड़ा नुकसान किसानों, मजदूरों, छोटे छोटे व्यापारियों और सेवा के क्षेत्र में काम करने वाले गरीबों को हो रहा है। गरीब एवं मध्यम वर्ग की आमदनी लगातार घट रही है। उनके खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार की आर्थिक नीतियों का पिछले वर्षों का यही नतीजा है।
अडानी पर बैंकों का कर्ज
पिछले वर्षों में सरकार की नीतियों के कारण जनता से टैक्स एवं बचत के रूप में बैंको में जमा धन का बहुत बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों को दिया जा रहा है। वर्ष 2020-21 में गौतम अडानी की कंपनियों के ऊपर बैको का 1 लाख 55 हजार 463 करोड रुपए का कर्ज था। जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 2लाख 20हजार 584 करोड रुपए हो गया है। गौतम अडानी दुनिया के चौथे सबसे धनी व्यक्ति हैं। इसके बाद भी वह भारतीय बैंकों का बहुत सारा पैसा पूर्व में नहीं चुका पाए। पिछले वर्षों में उनकी कंपनियों का लोन राइट ऑफ किया गया। कई अन्य लाभ सरकार द्वारा समय – समय पर उन्हें दिए गए। हर साल हजारों करोड़ रुपए का नया कर्जा भी उन्हें मिलता जा रहा है। उनके ऊपर भारतीय बैंकों का कर्ज बढ़ता ही जा रहा है। भारत के आम आदमी का जो पैसा बैंकों में जमा था। उसका एक बड़ा हिस्सा गौतम अडानी जैसे पूंजी पतियों को दिया जा रहा है। अब तो बड़े-बड़े पूंजीपति सरकार की गारंटी पर ग्लोबल इंटर नेशनल बैंक से भी कर्जा लेकर अपनी निजी हैसियत को बढ़ा रहे हैं। इसका लाभ सरकार और आम जनता को ना मिलकर, शासन और प्रशासनिक व्यवस्था के उच्च पदों पर बैठे हुए लोगों को मिल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य सरकारों से यह कहना की रेवड़ी की संस्कृति बंद करें। रेलवे द्वारा 60 वर्ष से ऊपर के लोगों को किराए में जो 50 फीसदी की रियायत दी जा रही थी। उसे बंद करना, शिक्षा एवं स्वास्थ्य का निजीकरण करने, जीएसटी में गुड्स और सेवाओं का दायरा बढ़ाकर आम जनता से भारी टैक्स वसूल करने की तीव्र प्रतिक्रिया अब जनता के बीच होना शुरू हो गई है। वर्तमान सरकार पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय ले रही है। गरीबों और मध्यम वर्गीय परिवारों को मिलने वाली सब्सिडी और छूट को बंद करके सरकार आम लोगों के जीवन को कष्टप्रद बना रही है। समय रहते सरकार को अपनी आर्थिक नीति ओर जनता की जरूरतों को समझना होगा। पूंजीपति, पूंजी के बल पर तथा एकाधिकार बनाकर अपनी तिजोरी सरकार की कृपा से भरते हैं। सरकारी खजाना गरीब और मध्यम वर्ग के टैक्स, बैंकों का खजाना आम जनता की बचत से भरता है। जब इनकी स्थिति कमजोर होगी। श्रम शक्ति की कोई कीमत नहीं होगी। उस स्थिति में पूंजीवाद भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा। यह सरकार को समझना होगा। श्रीलंका, चीन, नेपाल, तथा 60 से ज्यादा विकासशील देशों की वर्तमान आर्थिक बदहाली से समय रहते भारत सरकार को भी सबक लेने की जरूरत है।

 

 

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