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लेख - October 12, 2022

ढह गया समाजवाद का स्तंभ

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

महान समाजवादी चिंतक डा. राममनोहर लोहिया के शिष्य, भूमि-पुत्र, माटी के लाल, पिछड़ों और वंचितों के अग्रदूत, किसान-मज़दूरों के पैरोकार और देश भर के ‘नेताजी’ मुलायम सिंह यादव हमारे बीच नहीं रहे, तो लगता है मानो समाजवाद ही खामोश हो गया, चिर निद्रा में डूब गया, समाजवाद का आखिरी, पुख्ता स्तंभ ही ढह गया। मुलायम सचमुच में ही समाजवाद की परिभाषा थे। आज समाजवाद कहां शेष है? आम आदमी से जुड़ी, आम आदमी के लिए पीडि़त, आम आदमी के सरोकारों से बंधी राजनीति, जन-नीति और जन-सेवा कहां है? हालांकि समाजवाद के अवशेष ‘सामाजिक न्याय’ का शोर मचाते रहते हैं, लेकिन मुखौटों के पीछे वे किसी पूंजीवाद, सामंतशाह और घोटालेबाज के असली चेहरे हैं, लिहाजा आज समाजवाद के तौर पर मुलायम सिंह ज्यादा याद आ रहे हैं। एक गरीब किसान परिवार में उनका जन्म हुआ। किसी तरह पढ़ाई करके कॉलेज में शिक्षक बने। उन्हें अपने दौर का ‘लाल बहादुर शास्त्री’ कहा जाता था, क्योंकि उन्हें भी तकलीफें पार कर स्कूल-कॉलेज जाना पड़ता था। बहरहाल उसका वृत्तांत व्यापक है। डॉ. लोहिया ने उनकी प्रतिभा का आकलन अखाड़े में ही कर लिया था।

उन्हें समाजवादी राजनीति की दीक्षा दी गई, जिस मूलमंत्र को वह आजीवन जपते रहे। मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधायक चुने गए। उसके बाद 10 बार विधायक रहे, 7 बार सांसद चुने गए, भारत सरकार में रक्षा मंत्री बनने का गौरव हासिल किया और तीन बार सबसे बड़े राज्य उप्र के मुख्यमंत्री बने। देहावसान के वक़्त भी वह लोकसभा सांसद थे। इतनी लंबी राजनीतिक और सामाजिक पारी खेलने वाले शख्स की मौत कैसे हो सकती है? हर बार किसी भी शख्सियत के देहांत पर हम यही सवाल करते हैं कि उसका अंत कैसे संभव है? उसके युग का अवसान कैसे हो सकता है? यकीनन प्रकृति, नियति के नियमानुसार मुलायम सिंह का भी पार्थिव पटाक्षेप हुआ है, वह भी पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं, लेकिन वह हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे, क्योंकि वह सच्चे अर्थों में ‘जननेता’ थे। 1996-98 के कालखंड में जब वह देश के रक्षा मंत्री थे, तो उनके साथ अनौपचारिक संवादों में हिस्सा लेने का अवसर मिलता रहा। मुलायम सिर्फ वही राजनीतिक चेहरा नहीं थे, जिसने अयोध्या में हिंदू कारसेवकों पर गोलियों की बौछार कराई थी या संघ-भाजपा के मूल्यों के वह कतई विपरीत थे अथवा अयोध्या विवाद के बाद वह ‘मुस्लिमवादी’ हो गए थे। मुलायम का असली व्यक्तित्व इनसे बहुत भिन्न था। समझौते उन्हें भी करने पड़े।

गठबंधन राजनीति की मजबूरियां उनके सामने भी थीं। उन्होंने भी कई गलतियां कीं, लेकिन अनौपचारिक गपशप के दौरान वह लगातार आत्मावलोकन करते दिखते थे। उन्हें कुछ संदर्भों और कामों पर अफसोस भी होता था, लेकिन मुलायम सिंह का बुनियादी राजनीतिक व्यक्तित्व यह था कि वह पार्टी के औसत कार्यकर्ता के भी ‘मित्र’ थे। वह उनके पारिवारिक विवाह, जश्न के समारोह भी शामिल होते थे, तो मातम में भी साथ खड़े मिलते थे। कार्यकर्ता की बेटी की शादी में लाख-डेढ़ लाख रुपए की मदद करना उनके चारित्रिक व्यवहार का हिस्सा था। मुलायम ने साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों की भी खूब मदद की और हिंदी को सर्वश्रेष्ठ भाषा के तौर पर लागू करने के प्रयास किए। हिंदी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं के आपसी सामंजस्य को लेकर मुलायम सिंह ने करुणानिधि और एनटी रामाराव सरीखे कद्दावर नेताओं के साथ विमर्श किया। उन्हें भरोसा दिलाया कि वह अंग्रेजी के विरोधी हैं, भारतीय भाषाओं के नहीं। उन्होंने सरस्वती-पुत्रों के सम्मान में कई पुरस्कारों की भी घोषणा की। अब जब मुलायम के बहुरंगी, बहुआयामी जीवन पर किताबें लिखी जाएंगी, तो फिर सवाल उठेगा कि ऐसी शख्सियत की मौत कैसे संभव है? राजनीति में जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरीखे कद्दावर नेताओं के साथ मुलायम सिंह के दौर को नहीं भूल सकते, तो अमरीका के साथ परमाणु करार करने पर जब वामदलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब मुलायम की समाजवादी पार्टी के 39 सांसदों ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार बचाई थी, वह दौर भी ऐतिहासिक था।

 

 

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