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लेख - June 2, 2021

आदर्श शिक्षा के प्रहरी थे आदित्य शास्त्री!

-डॉ श्रीगोपाल नारसन-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

दुनिया के पहले एक सौ श्रेष्ठ कुलपतियों में प्रोफेसर आदित्य शास्त्री की गिनती होती थी।कम उम्र के बावजूद धीर गम्भीर, कर्त्तव्य परायणता ,सादगी,विद्वता ,मधुर व्यवहार के धनी आदित्य शास्त्री ने अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित बनस्थली विद्यापीठ की साख को कम नही होने दिया बल्कि स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में बुलन्दियों पर ले गए। इसी बनस्थली विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आदित्य शास्त्री को मात्र 58 वर्ष की उम्र में कोरोना ने निगल लिया है। वे 5 मई से जयपुर के फोर्टिस अस्पताल मे भर्ती थे। शुरुआती दिनों में कोरोना पॉजीटिव आए थे। मगर बाद में उनकी रिपोर्ट निगेटिव भी आ गई थी।परन्तु फिर भी क्रूर काल के पंजो से उन्हें बचाया नही जा सका।

राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के पोत्र आदित्य शास्त्री को महिला शिक्षा की प्रगति के लिए जाना जाता है। महिला शिक्षा में आधुनिक विचारों के समावेश के लिए जीवन भर कार्य करते रहे हैं। आदित्य शास्त्री अपने पीछे परिवार में पत्नी ईना शास्त्री व दो बेटे अंशुमान व ईशान शास्त्री को छोड़ कर गए हैं।प्रो. आदित्य शास्त्री को उनकी उच्च प्रतिभा के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय विज्ञान कांग्रेस संस्था के 103वें अधिवेशन मैसूर में जेसी बोस मेमोरियल अवार्ड से सम्मानित किया था। उनके निधन पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत , राज्यपाल कलराज मिश्र समेत कई जनप्रतिनिधियों आदि ने शोक व्यक्त किया है।जाने माने शिक्षा विद डॉ योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण ने उनके निधन को शिक्षा जगत की बड़ी क्षति बताया है। आदित्य महिला शिक्षा मे आधुनिक विचारो के समावेश के लिए जीवन भर कार्य करते रहे हैं।सन 1929 मे हीरालाल शास्त्री बनस्थली विधापीठ आए। उन्होंने 6 अक्टुबर सन 1935 मे बनस्थली विधापीठ की स्थापना जीवन कुटीर के रूप 5 -6 छात्राओ को साथ लेकर की थी। लेकिन बनस्थली विधापीठ के रूप मे सन1943 मे इस संस्था को पहचान मिली। इसी वर्ष स्नातक की पढाई शुरू हुई और सन 1983 मे बनस्थली विद्यापीठ को डीम्ड विश्व विधालय का दर्जा प्राप्त हुआ। बनस्थली विधापीठ मे देश विदेश की करीब 15 हजार छात्राए पंचमुखी शिक्षा ग्रहण कर रही है। बनस्थली विधापीठ महात्मा गांधी के स्त्री शिक्षा के सपने को साकार कर रहा है। यहां सभी बालिकांए,शिक्षक व कर्मचारी खादी के वस्त्र पहनते है। बनस्थली विधापीठ मे छात्राओ को घुडसवारी से लेकर हवाई जहाज उडाना तक सिखाया जाता है। यहां की छात्राएं देश विदेश में जाकर हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। बनस्थली विद्यापीठ महिला शिक्षा की राष्ट्रीय संस्था है। जहाँ शिशु कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर शिक्षण एंव अनुसंधान कार्य हो रहा है।बनस्थली विद्यापीठ को विश्व विद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम की धारा 3 के अधीन भारत सरकार ने विश्व विद्यालय मान्य संस्थान घोषित किया हुआ है। विद्यापीठ एसोसिएशन ऑफ इण्डियन यूनिवर्सिटीज तथा एसोसिएशन ऑफ कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटीज का यह विश्वविद्यालय सदस्य है।

विद्यापीठ का लक्ष्य पूर्व एंव पश्चिम की आध्यात्मिक विरासत एंव वैज्ञानिक उपलब्धि के समन्वय को व्यक्त करने वाली छात्राओं के सर्वतोभद्र व्यक्तित्व का विकास करना है।ग्राम पुननिर्माण का कार्यक्रम प्रारम्भ करने और साथ ही रचनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से सार्वजनिक कार्यकर्ता तैयार करने की इच्छा, विचार और योजना मन में लिए हुए, वनस्थली विद्यापीठ के संस्थापक स्व. पं. हीरालाल शास्त्री ने सन् 1929 में राज्य सरकार में गृह तथा विदेश विभाग के सचिव के पद को त्याग कर बन्थली (बनस्थली) जैसे सुदूर गाँव को अपने कार्यक्षेत्र के रुप में चुना था। उनके साथ उनकी पत्नी श्रीमती रतन शास्त्री भी इस कार्य के लिये आगे आईं।

यह शिक्षा सेवा कार्य करते हुए पं. हीरालाल शास्त्री एवं श्रीमती रतन शास्त्री की प्रतिभावान पुत्री का मात्र साढ़े बारह वर्ष की आयु अचानक 25 अप्रैल, सन1935 को केवल एक दिन की अस्वस्थता के पश्चात निधन हो गया। हीरा लाल शास्त्री को शान्ता बाई से समाज-सेवा की बड़ी उम्मीद थी। शांता बाई ने पुत्री के वियोग और रिक्तता की भावनात्मक पूर्ति के लिए अपने परिचितोंदृमित्रों की 5-6 बच्चियों को बुला कर उनके शिक्षण का कार्य आरम्भ कर दिया और इसके लिये 6 अक्टूबर,सन 1935 को श्रीशान्ता बाई शिक्षा-कुटीर की स्थापना की गई, जो बाद में बनस्थली विद्यापीठ के रुप में विकसित हुई।लड़कियों की शिक्षा के लिए बनी बनस्थली विद्यापीठ यानि यूनिवर्सिटी कमाल की जगह है।यहां 850 एकड़ का बड़ा कैंपस है और हर फ्लोर पर एक वॉर्डन जो छात्राओं को आठ बजे के बाद बिना परमिशन के कही नहीं जाने देतीं,जैसा कड़ा अनुशासन है। यहां लड़के दूर-दूर तक ‘पर’ नहीं मार सकते।बनस्थली से बीटेक और बीबीए , आईटी (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) जैसे कोर्स भी संचालित है। छात्राओं की पढाई की जिंदगी ऐसी है कि अगर घर से कोई चिट्ठी आती है तो पहले वॉर्डन मैडम उसे खोलकर पूरा पढ़ती है और फिर लड़की को देती हैं। कैंपस सिर्फ लड़कियों का है और उन्हें सिर्फ खादी के कपड़े पहनने की ही इजाजत है। कमरे में आयरन तक नहीं रख सकते। हॉस्टल से क्लासरूम की दूरी कम से कम पैदल बीस मिनट की है जिसके लिए बस चलती है। अगर बस समय से नहीं पकड़ पाए तो पैदल जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। अगर तबीयत बिगड़ती तो मात्र चालीस रुपये देकर एंबुलेंस सेवा ली जा सकती है। ऐसे में सहेली का साथ होना जरूरी है। बनस्थली की लड़कियों के मन मे अपनी सीनियर्स का बहुत सम्मान है और साथ ही दूसरे डिपार्टमेंट की टीचर्स से भी उतना ही लगाव जैसे अपने परिवार की हो।किसी से मिलने या बात करने की इजाजत यहां मर्यादा और अनुशासन के साथ है। पिता या निकट परिजन के अलावा कोई भी मिलने नहीं आ सकता। अगर पिता भी अवकाश में बेटी को घर ले जाना चाहते हैं तो ये ससुराल से बिटिया को मायके लायने से ज्यादा मुश्किल है। आपको एक चिट्ठी बनस्थली डाक से या फैक्स से भेजनी पड़ेगी। उस चिट्ठी में आने-जाने की तारीख और पिता के सिग्नेचर जरूर होने चाहिए। फिर पिता लेने आएंगे। सिग्नेचर मिलाये जाएंगे। मिले तो ठीक वरना बड़ी मुश्किल। आने-जाने की तारीख से लौटे तो ठीक वरना बड़ी मुश्किल।कुलमिलाकर छात्राओं के हित को सर्वपरि रखते हुए यहां कड़े नियम बनाये गए है।तभी तो यहां पढ़ने वाली हर बहन,बेटी पूरी तरह सुरक्षित है।आधी दुनिया को शिक्षा के क्षितिज पर पहुंचाने के लिए बनस्थली से बेहतर कुछ हो ही नही सकता।लेकिन चलते चलते बनस्थली विद्यापीठ रूपी गाड़ी का इंजन फेल हो जाना यानि कुलपति आदित्य शास्त्री का महाप्रयाण कर जाना कष्टकारी ही कहा जाएगा।परमात्मा उनकी आत्मा को शांति दे।

 

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