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लेख - June 8, 2021

छूट की राह

-सिद्वार्थ शंकर-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

कोरोना की दूसरी लहर में जान के साथ जहान बचाने की चिंता में सरकारों ने कुछ छूट के साथ बाजार खोलना शुरू किया है। यह समय दूसरी लहर के पहले जैसा ही है। तब भी बाजार खुलने शुरू हुए थे और हमारी लापरवाही ने देश को बारूद के ढेर पर बैठा दिया था। अब फिर बाजार खुलने लगे हैं तो जहान से ज्यादा जान की चिंता सताने लगी है। कोरोना के प्रति असावधानी फिर से हमें संकट में डाल सकती है। हालांकि, कहा जा रहा है कि इस बार लोग ज्यादा सावधान हंै और गाइडलाइन का पालन कर रहे हैं, मगर कुछ ऐसे भी हैं, जिनके चेहरे पर ना मास्क है और ना ही सुरक्षित दूरी का कोई उपाय। टीकाकरण भी अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा है, जहां वैक्सीन को रामबाण मान लिया जाए। इसलिए किसी भी सूरत में लापरवाही खुद के साथ दूसरों के लिए भी परेशानी का सबब बन सकती है। राज्यों ने दूसरी लहर के बीच ढील देना इसलिए शुरू कर दिया है, क्योंकि यह अब अपरिहार्य हो गया है। लंबे समय से कारोबारी गतिविधियां बंद पड़ी थीं। अर्थव्यवस्था को भारी चपत लग रही थी। आम लोगों को मुश्किलों से दो-चार होना पड़ रहा था। ऐसे पाबंदियों को चरणबद्ध तरीके से हटाने के अलावा कोई रास्ता बचता भी नहीं है। इसीलिए मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्य अपने-अपने हिसाब से प्रतिबंधों में ढील दे रहे हैं। सच तो यह है कि महामारी का खतरा कहीं से कम नहीं पड़ा है। अभी सिर्फ असर कम हुआ है। राहत की बात इतनी ही है कि संक्रमण की दर कम हुई है। मरीजों के स्वस्थ्य होने की दर भी 95 फीसद से ऊपर है। मौतों के आंकड़े भी नीचे आ रहे हैं। ऐसे में सावधानी के साथ काम-धंधे फिर से शुरू करने में कोई हर्ज नहीं। इससे तो हालात सामान्य बनाने में मदद ही मिलेगी। बंदी और पाबंदियों से सबसे ज्यादा मुश्किल रोजाना कमाने-खाने वाले तबके को हो रही है। इनमें दिहाड़ी मजदूरों से लेकर रेहड़ी-पटरी लगाने वाले तक हैं। छोटे-मोटे कारोबारी हैं। लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार इसी तबके पर पड़ी है। एक करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए। एक मोटा अनुमान यह है कि इस बार डेढ़ महीने की लॉकडाउन से देश को पंद्रह लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। मौजूदा हालात में फूंक-फूंक कर ही कदम उठाने की जरूरत है। एक साथ सारी गतिविधियों को खोल देने फिर से बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है। इसलिए हर जगह के हालात को देखते हुए ही ढील देना उचित होगा। छोटे-बड़े कारोबार ही राज्यों के राजस्व का स्रोत होते हैं। इसी से अर्थव्यवस्था चलती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हालात सामान्य बनाने में नागरिकों की भूमिका सबसे अहम है। ढील का मतलब यह कतई नहीं कि अब सब कुछ सामान्य हो चला है। जरा-सी छूट मिलते ही लोग किस कदर बेपरवाह हो जाते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तीसरी लहर का खतरा सामने है। ऐसे में महामारी से बचाव के लिए जरूरी नियमों का सख्ती से पालन ही हमें संकट से बचाएगा। वरना फिर से घरों में कैद होने की नौबत आ सकती है। महामारी को लेकर पूरा एक वित्त वर्ष हाहाकार में गुजरा। ऐसे विकट संकट को लेकर कोई पूवार्नुमान भी नहीं था। लोगों की जान बचाना प्राथमिकता रही। इसलिए हालात के अनुसार कदम उठाने के अलावा कोई चारा था भी नहीं। पहली तिमाही की मार का असर बाद की तिमाहियों पर पड़ना लाजिमी था। सिर्फ कृषि क्षेत्र ही था जिसने अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाए रखा और चारों तिमाहियों में इसकी वृद्धि दर साढ़े तीन से साढ़े चार फीसद बनी रही। जबकि विनिर्माण, निर्माण और सेवा क्षेत्र की तो पहली तीन तिमाहियों में हालत बहुत ही खराब रही। इसका असर रोजगार, उत्पादन, मांग और खपत पर साफ दिखा। सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं। ले-देकर चैथी तिमाही में हालात संभलने लगे थे और इनका असर दिखा भी। पहली तिमाही में निर्माण क्षेत्र साढ़े उनचास फीसद तक लुढ़क गया था, उसमें चैथी तिमाही में साढ़े चैदह फीसद की वृद्धि देखने को मिली। विनिर्माण क्षेत्र जो छत्तीस फीसद नीचे चला गया था, चैथी तिमाही में सात फीसद वृद्धि दिखा रहा था। इसी तरह राजकोषीय कोषीय घाटा साढ़े नौ फीसद तक जाने का अनुमान था, पर यह अब 9.2 फीसद पर ही रुक गया। आज हालात और ज्यादा चिंताजनक इसलिए भी हैं कि देश दूसरी लहर का सामना कर रहा है। और लहरों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि सरकार का दावा है कि दूसरी लहर का असर ज्यादा नहीं पड़ने वाला। पर ताजा आकंड़े बता रहे हैं कि इस साल मई में वाहनों की बिक्री गिरी है, पेट्रोल-डीजल की खपत में कम हुई है, उद्योगों में बिजली की मांग में कमी आई है, उत्पादन फिर से दस महीने के न्यूनतम स्तर पर आ गया, एक करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं और सनतानबे फीसद परिवारों की आय घट गई है। हाल में रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर पेश की है, उसे गौर से देखा जाए तो वह कम निराशाजनक नहीं है। इससे ज्यादा दूसरी लहर का और क्या असर होना बाकी है?

 

 

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