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लेख - December 26, 2022

कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव पर भारी पड़ा शिव-राज का आत्मविश्वास

-कृष्णमोहन झा-

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

मध्यप्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में शिवराज सरकार के विरुद्ध प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव का जो हश्र हुआ उस पर कोई आश्चर्य व्यक्त नहीं किया जा सकता। कांग्रेस को भी यह भलीभांति मालूम था कि प्रदेश की लोकप्रिय सरकार के विरुद्ध जो अविश्वास प्रस्ताव वह सदन में प्रस्तुत करने जा रही है उसे सदन में भारी बहुमत से खारिज कर दिया जाएगा।मजे की बात तो यह है कि अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान की नौबत ही नहीं आ पाई और उसे ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया। दरअसल यह अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस की रस्म अदायगी से अधिक कुछ नहीं था ,क्योंकि सदन में सरकार को घेरने की मंशा से पेश किया गया यह अविश्वास प्रस्ताव किसी भी मुद्दे पर शिवराज सरकार को बचाव की मुद्रा अपनाने के लिए विवश करने में असफल रहा। सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान शिवराज सरकार के मंत्रियों ने कांग्रेस के आरोपों का प्रभावी अंदाज में जो सिलसिलेवार जबाव दिया उसने तो कांग्रेस को ही बंगलें झांकने के लिए विवश कर दिया। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि यह अविश्वास प्रस्ताव विपक्षी कांग्रेस पार्टी के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ जिसने सदन के अंदर भी कांग्रेस पार्टी के आपसी मनमुटाव को उजागर कर दिया और अनजाने में ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर विजेता के रूप में उभरने का मनचाहा अवसर प्रदान कर दिया। शिवराज सरकार के विरुद्ध पेश अपना अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से ही खारिज होने के बाद विपक्षी कांग्रेस पार्टी को आत्ममंथन करना चाहिए कि मात्र रस्म अदायगी के लिए शिवराज सरकार के विरुद्ध पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव के औंधे मुंह गिरने से उसने ऐसी कौन सी उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर ली है जिस पर वह गर्व महसूस करने की अधिकारी बन गई है।

अविश्वास प्रस्ताव पर दो दिनों तक चली चर्चा के दौरान पूरे समय कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की अनुपस्थिति ने तो सदन के अंदर कांग्रेस को इतनी असहज स्थिति में पहुंचा दिया था कि वह सदन में पूर्व मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति का ठोस कारण बताने में भी असमर्थता अनुभव कर रही थी। कमल नाथ की अनुपस्थिति को लेकर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कांग्रेस पर जो तीखे कटाक्ष किए उसका कोई जवाब विपक्षी दल के पास नहीं था। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश की लोकप्रिय शिवराज सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के पक्ष में नहीं थे। बहस के दौरान पूरे समय कमलनाथ की अनुपस्थिति ने इस प्रश्न को भी जन्म दिया है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने सवा साल के कार्यकाल में ऐसी कोई उपलब्धि अर्जित नहीं की थी जिसे वे सदन में वर्तमान सरकार के लिए प्रेरक उदाहरण के रूप में पेश कर सकते थे या फिर पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में अपनी असफलताओं के लिए सत्ता पक्ष द्वारा की जाने वाली आलोचना को सहन करने का साहस उनके अंदर नहीं था। कारण चाहे जो रहा हो परन्तु सदन में कांग्रेस द्वारा द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कमलनाथ की अनुपस्थिति ने जो सवाल खड़े किए जा रहे हैं उनका जवाब देना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। राज्य विधानसभा में कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव का जो हश्र हुआ है उसे देखकर कोई भी यह समझने में असमर्थ है कि आखिर कौन सा राजनीतिक लाभ अर्जित करने की मंशा से उसने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया। ऐसा प्रतीत होता है कि शिवराज सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला पार्टी ने न तो सर्वसम्मति से किया था ,न ही सदन में यह प्रस्ताव पेश करने के पूर्व पर्याप्त होमवर्क किया गया इसीलिए सदन में उस पर बहस के दौरान पार्टी शिवराज सरकार के विरुद्ध कोई भी आरोप सिद्ध करने में असफल रही।

विधानसभा में कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव पर 15 घंटे का समय निर्धारित किया गया था। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को इस प्रस्ताव पर बोलने के लिए बराबर समय दिया गया। चर्चा के दौरान बीच बीच में हंगामे की स्थिति भी बनती रही। कांग्रेस ने शिवराज सरकार को घेरने का प्रयास तो पूरा किया परंतु सत्ता पक्ष की ओर से गृहमंत्री डा नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह आक्रामक अंदाज में मोर्चा संभाला उसके कारण विपक्ष ही बचाव की मुद्रा में आ गया। बहस के दौरान बार बार यह आभास होता रहा कि सदन में बिना किसी तैयारी के लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने के लिए शिवराज सरकार को भी कोई तैयारी नहीं करनी पड़ी। बहस के दौरान एक बार भी ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकार को असहज स्थिति में पहुंचा दिया है। आत्म विश्वास से लबरेज शिवराज सरकार के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्र के पास तो कांग्रेस के हर आरोप की काट मौजूद थीं। गृहमंत्री ने अपने हर तर्क की पुष्टि के लिए बाकायदा ठोस प्रमाण प्रस्तुत करके विपक्षी कांग्रेस पार्टी को बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया। गृहमंत्री जब विपक्ष के आरोपों की धज्जियां उडा रहे थे तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनका आत्मविश्वास कांग्रेस के अविश्वास पर भारी पड़ रहा है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने यूं तो अपने 104 पृष्ठों के अविश्वास प्रस्ताव में 51 बिंदुओं पर सरकार को घेरने की योजना बनाई थी परन्तु पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद अगर उसे अपने मंसूबों में सफलता नहीं मिली तो इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि कांग्रेस पार्टी ने इसके लिए पहले से कोई प्रभावी रणनीति तैयार नहीं की थी।

सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ की अनुपस्थिति ने एक ओर जहां पार्टी विधायकों के जोश और उत्साह को फीका करने में बड़ी भूमिका निभाई वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल भाजपा को उसे आड़े हाथों लेने का मौका भी उपलब्ध करा दिया। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्र ने चुटकी लेते हुए यह कहा कि कमलनाथ कहते हैं कि मैं सदन में भाजपा की बकवास सुनने के लिए क्यों जाऊं परंतु कांग्रेस पार्टी के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेने के लिए भी सदन में उनके उपस्थित न होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने उनकी अपनी पार्टी द्वारा पेश इस अविश्वास प्रस्ताव को बकवास मान लिया है। गृहमंत्री ने कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को तथ्यहीन और आधार हीन बताते हुए कहा कि इस तरह का प्रस्ताव सदन में पहली बार आया है। प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के कांग्रेस के आरोपों का दृढ़ता पूर्वक खंडन करते हुए गृहमंत्री ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नक्सलियों, मालवा में सिमी के आतंकवादियों और चंबल से लेकर विंध्य तक डाकुओं की वारदातें बढ़ने लगी थीं , वल्लभ भवन में दलालों ने अड्डा जमा लिया था और बड़ी संख्या में अनावश्यक ट्रांसफर किए जा रहे थे। किसानों की कर्ज़ माफी का दिखावा किया जा रहा था। कांग्रेस सरकार के पतन के बाद गठित भाजपा सरकार ने प्रदेश में हर क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए सारी व्यवस्था को चाक चौबंद किया। गृहमंत्री ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह आदिवासी हितैषी होने का दावा करती है परंतु हकीकत में कांग्रेस ने आदिवासी नेताओं को महत्वपूर्ण पदों से नवाजने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई।

अविश्वास प्रस्ताव पर दो दिनों तक चली बहस का उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव को लचर और झूठ का पुलिंदा निरूपित किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस का भरोसा लोकतंत्र में नहीं है। भाजपा ने कांग्रेस की सरकार नहीं गिराई बल्कि उसका अहंकार ही उसके पतन के लिए जिम्मेदार है। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर कांग्रेस सरकार ने जनता की भलाई के कामों में दिलचस्पी दिखाई होती तो प्रदेश में उसे सत्ता से बेदखल नहीं होना पड़ता। मुख्यमंत्री चौहान ने पिछली कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार का लोकव्यापीकरण करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उस समय भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को चुन चुनकर निशाना बनाया गया परंतु भाजपा का गठन होते ही हमने स्पष्ट कर दिया था कि यह सरकार कभी अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध विद्वेषपूर्ण कार्यवाही नहीं करेगी। शिवराज सिंह चौहान ने पिछली कांग्रेस सरकार पर किसानों के साथ ऋणमाफी के मामले में वादा खिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछली सरकार ने किसानों को डिफाल्टर बना कर उन पर ब्याज का बोझ दिया। भाजपा सरकार बनते ही हमने किसानों को राहत पहुंचाने के लिए तत्परता के साथ कदम उठाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार ने उसकी पूर्ववर्ती भाजपा सरकारों द्वारा जनता की भलाई के उद्देश्य से प्रारंभ की गई योजनाओं को बंद करने का आरोप भी लगाया। मुख्यमंत्री जब अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का उत्तर दे रहे थे तब सदन में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की गैर मौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही। बहरहाल, कांग्रेस के इस अविश्वास प्रस्ताव का जो हश्र पहले से तय था,वही हुआ परंतु कांग्रेस के प्रदेश संगठन में व्याप्त मतभेदों को उजागर कर दिया। कांग्रेस के पास राज्य विधानसभा में जो संख्या बल है वह इतना कम भी नहीं है कि उसके द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव को इस नियति का शिकार होना पड़ता। वास्तव में , कांग्रेस को भी अब अंदर ही अंदर यह महसूस हो रहा होगा कि उसने प्रदेश की लोकप्रिय सरकार को फंसाने के लिए जो जाल बुना था उसमें वह खुद ही फंसकर रह गई। हकीकत यह है कि बिना किसी तैयारी के उसने जो अविश्वास प्रस्ताव पेश किया उसका भरपूर राजनीतिक लाभ उठाने में शिवराज सरकार ने कोई भूल नहीं की इसलिए आज वह विजेता की मुद्रा में दिखाई दे रही है। कांग्रेस के पास तो हाथ मलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

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