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लेख - January 5, 2023

दिल्ली में दरिंदे भी!

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

बेशक दिल्ली भारत की राष्ट्रीय राजधानी है, लेकिन उसका आपराधिक चरित्र और भी बर्बर, निर्मम, जघन्य और जंगली होता जा रहा है। औसतन प्रत्येक 4 मिनट में महिला किसी-न-किसी अपराध की शिकार होती है। दिल्ली को अब ‘अपराध का शहर’ करार दिया जा सकता है, जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार, संसद, सर्वोच्च अदालत और विभिन्न देशों के दूतावास होने के बावजूद औसतन महिला, बहिन-बेटी ‘असुरक्षित’ है। नए साल के अंधेरे में, भोर अभी फूटी भी नहीं थी, कंझावला इलाके में कुछ दरिंदे जानवरों ने एक 20-साला युवती के साथ जो हैवानियत की, उस पर हम लगातार सोचते रहे कि क्या टिप्पणी की जाए? हम सरकार नहीं हैं, हम जांच एजेंसी नहीं हैं, हम पुलिस भी नहीं होना चाहते और न ही हम चश्मदीद हैं। ऐसी वहशियाना कसाईगीरी पर कुछ भी कहा जाए, वह अप्रासंगिक और उकसाऊ नहीं होना चाहिए। अब तो नया खुलासा सामने आया है कि कार चालकों ने कुल 40 किलोमीटर तक फंसी हुई लडक़ी को घसीटा। वह बेचारी रोती-कलपती रही, तड़पती रही, अंतत: उसका जिस्म ‘कंकाल’ बन गया, खून की एक बूंद भी शेष नहीं रही। क्या किसी राजधानी-शहर में ऐसी दरिंदगी की कल्पना भी की जा सकती है? एक सहज सवाल जेहन में उभरता रहा कि क्या इनसान भी ऐसा जानवर हो सकता है?

क्या मानवता भी पाशविकता और हैवानियत की इतनी पराकाष्ठा तक पहुंच सकती है? सिर्फ यही वारदात दिल्ली को ‘दाग़दार’ और शर्मसार नहीं करती। कंझावला के पास ही वह छाबला क्षेत्र है, जहां कुछ अर्से पहले एक लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था और उसकी हत्या कर शव को हरियाणा के रेवाड़ी में एक तालाब में फेंक दिया गया था। मृतका की देह के निशान और जख्म चीख-चीख कर बयां कर रहे थे कि बलात्कारी इनसान नहीं, राक्षस थे। अदालतों में केस चला, फांसी की सजा भी सुनाई गई, लेकिन उन दरिंदों को सर्वोच्च अदालत ने ‘बरी’ घोषित कर दिया। इनसानियत और संवेदनशीलता स्तब्ध होकर रह गई, आत्मा घुट-घुट कर चीखती रही, लेकिन शीर्ष अदालत के फैसले को स्वीकार करना भी हमारा दायित्व है। कानून की भाषा भावनाओं को नहीं, सबूत को ही मानती है, बाकी सब कुछ बेमानी है। अलबत्ता आत्मा ने आज तक उस फैसले को ‘इंसाफ’ नहीं माना। इसी राजधानी दिल्ली में ‘निर्भया हत्याकांड’ को 10 साल गुजऱ चुके हैं। संसद की विशेष बैठक तक बुलाई गई। महिला अपराध संबंधी कानून में संशोधन किए गए। दो न्यायाधीशों ने कानून की परिभाषा और शब्दावली को नए सिरे से लिखा। भारत सरकार ने 1000 करोड़ रुपए का कोष बनाया, जिसे अधिकांश मामलों में खर्च ही नहीं किया जाता।

संतोष है कि निर्भया के बलात्कारियों और हत्यारों को फांसी पर लटका दिया गया। राजधानी दिल्ली में ही इनसानी रिश्तों की हत्याएं कर शव को टुुकड़े-टुकड़े किया जाता रहा है। छेड़छाड़, फब्तियां कसना और मासूमों के साथ भी बलात्कार करना तो बहुत छोटे अपराध महसूस होने लगे हैं। शुक्र है कि कंझावला केस में लडक़ी के साथ यौन-शोषण की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कार के पहिए में फंसने और लंबी दूरी तक घिसटते रहने से लडक़ी के जिस्म पर करीब 40 निशान मिले हैं। फोरेंसिक रपट के मुताबिक, कार के अंदर खून के धब्बे और लडक़ी की मौजूदगी के निशान या सबूत भी नहीं मिले हैं। कार के अगले बाएं पहिए के नीचे खून के धब्बे जरूर पाए गए हैं। बहरहाल हम किसी भी निष्कर्ष की निर्णायक पुष्टि नहीं कर सकते, क्योंकि जांच अभी जारी है। यह एक हादसा भी हो सकता है, लेकिन हमें यह ‘राक्षसी हत्याकांड’ लगता है। बहुत दावे किए जाते रहे हैं कि दिल्ली में, कोने-कोने पर, सीसीटीवी का जाल फैला है, लेकिन दुर्भाग्य है कि हत्याकांड का एक भी संपूर्ण फुटेज उपलब्ध नहीं हुआ है। चश्मदीद साक्ष्य हैं, वे भरोसेमंद साबित होंगे, यह जांच हो रही है।

 

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