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लेख - July 8, 2021

चुनावी राज्यों पर दांव

-सिद्वार्थ शंकर-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार ऐसे समय में किया गया है जब अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। इसके अलावा पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं। हालांकि निगाहें यूपी पर टिकी होंगी, जहां भाजपा के सामने एक बार फिर सत्ता में वापसी की चुनौती होगी। यूपी चुनाव को देखते हुए सोशल इंजीनियरिंग के तहत सूबे से चार अहम नाम मंत्रिमंडल में शामिल किए गए हैं। इसमें अपना दल की अनुप्रिया पटेल, भाजपा से कौशल किशोर, बीएल शर्मा, एसपी बघेल और अजय मिश्र टेनी शामिल हैं। कौशल किशोर यूपी के मोहन लालगंज से सांसद हैं। वहीं बीएल वर्मा वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। एसपी बघेल आगरा से भाजपा सांसद हैं। अजय मिश्र टेनी खीरी लोकसभा सीट से सांसद हैं। इन नामों पर गौर करें तो कौशल किशोर और एसपी बघेल एससी चेहरा हैं वहीं बीएल वर्मा ओबीसी वर्ग से आते हैं। जबकि अजय मिश्र टेनी ब्राह्मण चेहरा हैं। कुल मिलाकर सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश है। हाल में जितिन प्रसाद जब कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए तो इसे भी पार्टी की ओर से ब्राह्मण वोट भुनाने की कोशिश के तौर पर देखा गया। दरअसल जानकारों के मुताबिक योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में कुछ मौकों पर ब्राह्मणों में सरकार के प्रति नाराजगी जैसी बात सामने आती रही है। यूपी चुनाव को देखते हुए पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों का खास ध्यान रखा गया है। जाहिर तौर पर इसके जरिए मोदी सरकार ये दिखाने की कोशिश में है पिछड़ी जातियों को महत्व दिया गया है।

जब महामारी, खराब अर्थव्यवस्था और महंगाई से देश जूझ रहा है, ऐसे में हर लिहाज से मोदी सरकार के लिए ये विस्तार अभी बेहद जरूरी है। इसके अलावा संसद का मानसून सत्र 19 जुलाई से शुरू हो रहा है और नए मंत्रियों को अपने मंत्रालयों में घुलने-मिलने के लिए वक्त चाहिए होगा। कोरोना की दूसरी लहर में केंद्र सरकार के मिस मैनेजमेंटकी हर ओर आलोचना हुई। गवर्नेंस में क्वालिटी की कमी नजर आई। स्मार्ट सिटी हो या फिर कैशलेस इकोनॉमी, मोदी का कोई भी पसंदीदा प्रोजेक्ट ट्रैक पर नहीं है। मोदी को टॉप लेवल पर ज्यादा काबिलियत वाली टीम की जरूरत है। इकोनॉमी में ऐसी गिरावट कभी नहीं आई, जैसी अभी है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल के दामों पर जनता के गुस्से को शांत करना जरूरी है। रोजगार के मौके कम हो रहे हैं और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते जा रहे हैं, इससे भी लोग निराश हैं। ऐसे में दिशाहीन हो चुकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार के भीतर उच्च स्तर पर ज्यादा क्षमता की जरूरत होगी। मोदी को कैबिनेट में जातीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के साथ काबिल मंत्रियों का संतुलन बैठाना है। कैबिनेट में फील गुड फैक्टर को बढ़ाने के लिए भी नए चेहरों को शामिल करना जरूरी हो गया है। 2014 से मोदी सरकार ने कई जीत और हार का सामना किया। हाल में बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भाजपा और समर्थकों के उत्साह पर बुरा असर पड़ा है। अगर सांसदों में से काबिल लोगों को कैबिनेट में शामिल किया जाता है तो जिस राज्य से मंत्री शामिल किए गए हैं, वहां पार्टी और उसके नेताओं का मनोबल बढ़ेगा। पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में अभी सियासी खींचतान चल रही। क्षेत्रीय और जातीय गणित के आधार पर नेताओं को कैबिनेट में शामिल कर सत्ता का मौका देने से प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ेगी। उधर, पशुपति पारस और जेडीयू के 4 मंत्री बनाने से उन्हें क्षेत्र से लेकर केंद्र तक समीकरण साधने में मदद मिलेगी।

सवाल यह भी है कि आखिर कैबिनेट विस्तार की जरूरत क्यों पड़ी? कैबिनेट विस्तार की सबसे बड़ी जरूरत उत्तर प्रदेश, समेत कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव है तो कहीं अपने सहयोगी पार्टियों और निष्ठावान कार्यकर्ताओं से किए गए वादे भी निभाने हैं। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के इस कार्यकाल में कई मंत्रियों के निधन होने और कई मंत्रियों जैसे नीतिन गड़करी, पीयूष गोयल, स्मृति ईरानी, नरेंद्र सिंह तोमर जैसे कई मंत्रियों पर काम का भार कम करने की भी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।

अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होना है। भाजपा की सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश पर है। यहां चुनाव को ध्यान में रखकर यूपी से भाजपा की सहयोगी अपना दल और निषाद पार्टी को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसमें भी जाति समीकरण को साधने की कोशिश होगी जिससे कि चुनाव के हिसाब से सभी जातियो को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। यह चुनावी राज्य में एक संदेश देने की कोशिश है। कैबिनेट विस्तार के जरिए भाजपा अपने सहयोगी दलों और निष्ठावान नेताओं को भी मंत्री पद देकर उन्हें खुश करने की कोशिश में रही। इसमें सबसे बड़ा नाम मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार गिराने में सबसे बड़ा योगदान देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल चुनाव में भी मेहनत करने वालों को मंत्रिमंडल शामिल किया गया है। महाराष्ट्र में पार्टी के बड़े नेता नारायण राणे भी मंत्रिमंडल से शामिल किए गए हैं। वहीं असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी मंत्री बने हैं। दूसरी तरफ बिहार से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नेताओं और लोक जनशक्ति पार्टी में फूट डालकर अलग हुए पशुपति पारस गुट को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।

 

 

 

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