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लेख - January 11, 2022

प्रधानमंत्री की सुरक्षा अहम मसला

-त्रिलोक कपूर-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

कारगिल का युद्ध अभी चल ही रहा था लेकिन तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी नरेंद्र मोदी हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के साथ सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए अग्रिम मोर्चे पर पहुंचे थे। नरेंद्र मोदी ने ही श्रीनगर के लाल चैक पर तिरंगा उस समय लहराया था जब आतंकवाद चरम पर था। प्रधानमंत्री बनने के बाद पंद्रह अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के दिन बुलेट प्रूफ मंच की रिवायत को खत्म कर देश की जनता से सीधा संवाद स्थापित नरेंद्र मोदी ने ही किया था। भारतीय वायु सेना के अधिकारी अभिनंदन की पाकिस्तान में आपातकालीन लैंडिंग के बाद उपजे घटनाक्रम में पाकिस्तान के गले में अंगूठा देकर अभिनंदन को सकुशल लाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे। पुलवामा और उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने वाले प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे। गलवान में चीनी सेना के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद कर अपनी मजबूत पहचान बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे। आखिर 5 जनवरी 2022 को पंजाब में बिना रैली किए अपने प्रेरणा स्त्रोत भगत सिंह को श्रद्धांजलि दिए बिना वापस दिल्ली क्यों लौटे? यह प्रश्न बार-बार कौंध रहा है कि जो व्यक्ति दृढ़ इच्छा शक्ति का धनी हो, जिसने अतीत में रैली की संख्या को ध्यान न देकर भी कई रैलियों को संबोधित किया हो, आखिर वो वापस क्यों लौटे। क्या देश के विपक्षी दल घृणा की राजनीति कर रहे हैं, क्या विपक्षी दल मोदी विरोध को प्रधानमंत्री के विरोध में बदलने की साजिश कर रहे हैं, जैसे उन्हें पता हो कि उनके दल से कोई प्रधानमंत्री अब बनेगा ही नहीं। इन प्रश्नों का उत्तर नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को गहराई से परख कर ही चल सकता है।

मोदी वैसे तो प्रधानमंत्री हैं, लेकिन कदम-कदम पर प्रधानमंत्री पद की मर्यादा, नियम, निर्देश, प्रोटोकॉल और सीमाओं का उल्लंघन करने से बचते हैं। जब पंजाब पुलिस के महानिदेशक ने कहा कि आपको अब वापस जाना पड़ेगा तो एसपीजी के नियम के अनुसार उन्होंने वापस जाना सही समझा। सोचिए कि वो आदेश दे देते कि मुझे तो रैली में जाना ही है तो अराजक तत्त्वों के साथ उस समय कैसी कार्रवाई हो सकती थी। लेकिन इस पूरे प्रकरण में पंजाब सरकार, पंजाब पुलिस, पंजाब कांग्रेस और कांग्रेस प्रवक्ताओं का आचरण, कार्यप्रणाली और सोच दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुराग्रहों से प्रेरित रही। आखिर क्या कारण थे कि मुख्यमंत्री चरनजीत चन्नी, मुख्य सचिव एवं पुलिस महानिदेशक प्रधानमंत्री के स्वागत में क्यों नहीं आए। मुख्यमंत्री चन्नी कोविड नियमों का हवाला देकर दूर रहे तो 6 जनवरी को मीडिया कर्मियों को बिना मास्क लगाए क्यों इंटरव्यू दे रहे थे, क्या उन्हें मीडिया कर्मियों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने से बचना नहीं चाहिए था। पुलिस महानिदेशक अगर राजनीतिक इशारों की भाषा को ही समझते हों तो उन्हें त्यागपत्र देकर किसी दल की सदस्य्ता ग्रहण करनी चाहिए। इससे भी आगे नवजोत सिंह सिद्धू का 5 जनवरी सुबह का बयान कि राहुल गांधी विदेश में गुप्त बैठक करने गए हैं। प्रियंका गांधी का खुद एक दिन पहले पृथकवास में जाना एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूट की जानकारी प्रदर्शनकारियों को किसने दी? रूट को पूरी तरह जांचने के बाद उपयुक्त होने बारे सर्टिफिकेट किसने और कैसे दिया। प्रतिबंधित संगठन को सड़क रोकने की इजाजत किसने दी। अगर नहीं दी तो पंजाब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया। राजनीतिक अराजकता क्या होती है, ये समझना हो तो आजकल पंजाब के हालात देख लीजिए। किसानों ने पिछले एक साल से आंदोलन केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को वापस करने के लिए किया था। अब जब केंद्र सरकार ने ये तीनों कानून वापस ले लिए हैं तो अब ये कौन किसान हैं जो भाजपा की रैली में जाने वाले लोगों को जबरदस्ती रोक रहे हैं, उन्हें पीट रहे हैं तथा रैली में आने-जाने वाली बसों, गाडि़यों को डंडे, लाठियों का डर दिखाकर रोक रहे हैं। पंजाब सरकार उन्हें मासूम किसान बताकर उन पर कोई कानूनी कार्रवाई न करके ऐसा कर रहे लोगों को अराजकता की ओर बढ़ा रही है।

वास्तव में ये किसानों के भेस में अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ता हैं क्योंकि जिन किसान यूनियनों, संगठनों ने कृषि कानूनों को वापस करने के लिए पिछले एक साल से संघर्ष किया, उन सभी ने लगभग अपनी पार्टी बना ली है या किसी पार्टी विशेष को समर्थन दे दिया है। पंजाब में एक कहावत है ‘चोर भी चरडे़ जवाब भी करड़े।’ पूरी कांग्रेस ने जिस तरह से इस प्रकरण के बाद विषवमन किया तो वो संविधान के मूल्यों, भारत के संघीय ढांचे और सबसे पुरानी पार्टी के सिद्धांतों से बाहर था। जो प्रश्न कांग्रेस ने खड़े किए, उनके सवाल भी उन्हीं प्रश्नों में थे। पहला प्रश्न, रैली में लोग न थे तो रैली हो जाने देते। दूसरा प्रश्न कि प्रधानमंत्री ने 20 मिनट पहले सड़क मार्ग से जाना तय किया, तो पंजाब पुलिस बताए कि हवाई मार्ग पर जाने से भी वैकल्पिक सड़क मार्ग खाली रखना होता है, वो क्यों नहीं रखा गया। तीसरा सवाल कांग्रेस पूछ रही है कि प्रधानमंत्री वापस क्यों गए। पुलिस महानिदेशक पंजाब ने जब वापस जाने का निर्णय सुनाया तो क्या एसपीजी और प्रधानमंत्री विपरीत फैसला कर असुखद स्थिति पैदा होने देते। कांग्रेस के सारे प्रश्न-आरोप इस मामले में बौने हैं। कांग्रेस, चन्नी और उनके सलाहकार भूल गए कि यह ठीक है कि उनकी पार्टी की सरकार है, परंतु सरकार की कोई पार्टी नहीं होती और सरकार कभी पार्टी नहीं होती। चन्नी का मुख्यमंत्री के बजाय मात्र कांग्रेस के नुमाइंदे के तौर पर व्यवहार करना दुःखद रहा। हो सकता है कि सिद्धू ने चन्नी को पटखनी देने के लिए कोई योजना बनाई हो। हो यह भी सकता है कि चन्नी ने सिद्धू से बड़ा कांग्रेसी बताने के लिए किया हो। हो कुछ भी सकता है, लेकिन यह सब जांच के विषय हैं। उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है। लेकिन भारत को मजबूत बनाने के लिए छोटी सोच रखने वाली पार्टियों को अब जनता ही सबक सिखाए। उन पार्टियों को ध्यान में रखना होगा कि उन्हें मोदी पसंद नहीं तो उनकी खिलाफत करो, पर प्रधानमंत्री सबके हैं, भारत के हैं, बतौर प्रधानमंत्री आपको सम्मान देना ही होगा क्योंकि वो लोकतांत्रिक तरीके से जीते हैं।

 

 

 

 

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