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लेख - January 11, 2022

युवा चेतना के संवाहक स्वामी विवेकानंद …….!

-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

स्वामी विवेकानंद को युवा चेतना का संवाहक कहे तो अतिश्योक्ति नही होगी।विवेकानंद संसार की एक ऐसी दिव्य विभूति हुई है जिन्होंने अपने अल्पायु जीवन मे कई जन्मों का सार्थक काम कर युवाओं के सामने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया था।स्वामी विवेकानंद न सिर्फ एक व्यक्ति रहे है बल्कि वे एक सार्थक सोच के धनी रहे है,एक विचारशील व्यक्तित्व रहे है ,स्वयं में एक क्रांतिदूत रहे है,जिन्होंने नवनिर्माण व नवराष्ट्र की सोच विकसित की। वे नैतिक मूल्यों के विकास एवं युवा चेतना के जागरण हेतु प्रतिबद्ध रहे तो मानवीय मूल्यों के पुनरुत्थान के सजग प्रहरी, अध्यात्म दर्शन और संस्कृति को जीवंतता देने वाली संजीवनी बूटी भी उन्हें कहा जा सकता है।विवेकानंद वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए । स्वामी विवेकानन्द आज भी देश ही नही दुनियाभर के युवाओं के आदर्श कहे जा सकते हैं। उनकी सोच रही कि युवको को शारीरिक प्रगति से ज्यादा आंतरिक प्रगति की आवश्यकता है। उन्होंने युवकों को प्रेरणा देते हुए कहा था कि पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और अंत में उसे स्वीकार कर लिया जाता है। वे युवकों में जोश भरते हुए कहा करते थे कि उठो मेरे शेरों ! इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो। जो तुम सोचते हो वह हो जाओगे। ऐसी ही कुछ प्रेरणाएं हैं जो आज भी युवकों को आन्दोलित करती हैं, सतपथ दिखाती हैं और जीवन जीने का दर्शन बोध कराती हैं।
रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद एक ऐसे युवा संत हुए जिनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत था। राष्ट्र के दीन-हीनजनों की सेवा को ही वे ईश्वर की सच्ची पूजा मानते थे।
इस युवा संन्यासी ने निजी मुक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया था, बल्कि करोड़ों देशवासियों के उत्थान को ही अपना जीवन-लक्ष्य बनाया। उनके सदवचन, किसी की भी जिंदगी परिवर्तित कर सकते है।उनके शब्दों में, ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं।वे स्वयं को स्वयं से मिलाते हुए कहते है कि वह हम ही हैं, जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है। जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएं अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग चाहे वह अच्छा हो या बुरा, भगवान तक जाता है।
किसी की निंदा न करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो जरूर बढ़ाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते हैं, तो अपने हाथ जोड़िए, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिए और उन्हें उनके मार्ग पर जाने दीजिए।आत्मा के लिए कुछ असंभव है। ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है। अगर कोई पाप है, तो वो यही हैय ये कहना कि ‘तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं। अगर धन दूसरों की भलाई करने में मदद करे, तो इसका कुछ मूल्य है अन्यथा ये सिर्फ बुराई का एक ढेर है और इससे जितना जल्दी छुटकारा मिल जाए, उतना बेहतर है।
जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिए, नहीं तो लोगों का विश्वास उठ जाता है।उस व्यक्ति ने अमरत्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता। हम वह हैं, जो हमें हमारी सोच ने बनाया है इसलिए इस बात का ध्यान रखिए कि आप क्या सोचते हैं। उनकी दृष्टि में,शब्द गौण हैं, विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते। सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा। विश्व एक व्यायामशाला है, जहां हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आए, आप यकीन कर सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर चल रहे रहे हैं।यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दुसरों के लिए जीते हैं, वे वास्तव में अच्छा जीवन जीते हैं।उन्हें भगवान की एक परम प्रिय आत्मा के रूप में पूजा जाना चाहिए, इस या अगले जीवन की सभी चीजों से बढ़कर,स्वयं में विश्वास करना और अधिक विस्तार से पढ़ाया और अभ्यास कराया गया होता, तो उन्हें यकीन था कि बुराइयों और दुःख का एक बहुत बड़ा हिस्सा गायब हो गया होता है।बाहरी स्वभाव अंदरुनी स्वभाव का ही बड़ा रूप है।हम जितना ज्यादा बाहर जाएं और दूसरों का भला करें, हमारा हृदय उतना ही शुद्ध व मजबूत होगा ।
स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् सन 1893में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी ,यह संस्थाआज भी सक्रिय है। वे रामकृष्ण परमहंस के परमशिष्य थे। कोलकत्ता के एक कुलीन परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद आरंभ से ही आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे। वे मानव जाति की सेवा को परमात्मा की सेवा मानते थे।स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। उन्होने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया।तभी तो आज भी स्वामी विवेकानंद को लोग उनके काम से जानते है।उनकी आध्यात्मिक शक्ति को पहचानते है और युवाओं के लिए उन्हें प्रेरक मानते है।स्वामी विवेकानंद होने का अर्थ ही मानव कल्याण है और मानव कल्याण के मूल में सर्वप्रथम है सत्य का बोध ,वही से सदपथ पर चलकर नही पीढ़ी के प्रेरक स्वामी विवेकानंद बन पाए।जिन्हें युवाओं के प्रेरक के रूप में सदा याद किया जाएगा।

 

 

 

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