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लेख - May 20, 2022

सौहार्द जरूरी

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

जबसे राम जन्म भूमि आंदोलन की शुरुआत हुई है, देश में एक माहौल मुसलमानों के खिलाफ बना है। मुसलमानों पर संदेह किया जाने लगा। ऐसी बात नहीं है कि यह पहले नहीं था। परंतु अब वह भावना उभर कर सार्वजनिक चर्चा में आने लगी है और आज एक खाई के रूप में परिवर्तित होती नजर आ रही है। इसमें हमारे दो धार्मिक सीरियलों महाभारत व रामायण का भी प्रभाव है। मैंने स्वयं देखा है लोग जूते-चप्पल उतार कर यह सीरियल देखते थे। इस आंदोलन का राजनीतिक लाभ जिन्हें उठाना था उन्होंने भरपूर उठाया। इस आंदोलन से उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी का यह भ्रम भी टूट चुका है कि आप अल्पसंख्यक समुदाय की उपेक्षा करेंगे तो देश हिंसा में डूब जाएगा इत्यादि-इत्यादि और आप सत्ता में नहीं आ सकते। आज के सत्तारूढ़ दल ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया, फिर भी 543 लोकसभा सीटों में से 303 सीटें जीता है जो इसका प्रणाम है। परंतु आज जो हम देख रहे हैं लाउडस्पीकर विवाद, हनुमान चालीसा का पाठ, ज्ञानवापी मस्जिद तो कहीं अज़ान के समय शोर-गुल, बुलडोज़र इत्यादि-इत्यादि कार्यवाहियों से वातावरण बनाया जा रहा है, विशेषकर उन राज्यों में जहां केन्द्र की सत्तारूढ़ सरकार की पार्टी नहीं है। हम पहले भारतीय हैं, फिर हमारा धर्म, पंथ या विचारधारा आती है।

यह भाव लुप्त हो रहा है, लेकिन यह वातावरण हमारे देश को एक गंभीर धार्मिक हिंसा की ओर ले जा रहा है, जो कि आज तक हमने देखी नहीं है। कश्मीर की घटनाएं व बंबई बम ब्लास्ट एक विदेशी साजिश है, न कि किसी धाार्मिक षड्यंत्र का परिणाम। हमें इस तथ्य को समझना होगा। 1947 का देश के विभाजन का जख्म हम सबके दिलों में है, लेकिन वह जख्म उस पीढ़ी के साथ घुल चुका है। जिन्नाह के कहने पर ही भारत का विभाजन हुआ था। यह इतिहास है। एक जमाना था 1975 से पहले का जब किसी एक शहर में दंगा होता था तो उसकी शृंखला 30-35 शहरों में घंटों में बन जाती थी, परंतु आपातकाल में एक ही जेल में रहने के कारण दोनों समुदायों के नेताओं ने एक-दूसरे को समझा और उसका परिणाम है कि आज दंगों की शृंखला नहीं बनती। इसमें कोई दो मत नहीं है कि मुस्लिम आक्रमणकारी थे और 11वीं शाताब्दी से हमला करके हमारे उपमहाद्वीप को लूट रहे थे। परंतु यह भी सत्य है कि मिस्र, मध्य एशिया, ईरान, अफगानिस्तान के राजाओं ने हम पर, 739 वर्षों तक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज किया, जिसके मध्य पांच राजवंश के 50 राजा हुए।

अवश्य ही उन्होंने अपनी संस्कृति, धर्म को फैलाने के लिए अनुचित कार्य भी किए होंगे। जो लोग संस्कृति की बात करते हैं, उन्हें राजधर्म, राष्ट्रहित और संस्कृति को समझना चाहिए। आज हम रूस के साथ खड़े हैं, क्या हमारा प्रधानमंत्री दिल पर हाथ रख कर कह सकता है कि वह भारतीय हिंदू संस्कृति के अनुसार बनी नीति पर चल रहा है। नहीं, क्योंकि हमारा राष्ट्रहित हमें मजबूर कर रहा है कि हम रूस के साथ जाएं। ताज महल को लेकर नया विवाद छिड़ चुका है। कुतुब मीनार, ताज महल व दिल्ली का लाल किला हिंदू मंदिर थे या हिंदू राजाओं के किले थे, यह मूल विवाद है। इसके अलावा ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा जोर-शोर से सबके ध्यान में आया है। मैं लगभग 40-45 साल पहले बनारस गया था। वहां मैंने स्वयं मस्जिद की दीवार के पिछवाडे़ हिंदू संस्कृति के स्पष्ट चिन्ह देखे थे। मैं मस्जिद में जाना चाहता था, पर मुझे मना कर दिया गया। आज कोई भी मुसलमान श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा जाए, वह बताए कि उसका क्या स्पष्टीकरण है? हमें इतिहास को इतिहास के चश्मे से देखना चाहिए, न कि धर्म के चश्मे से। आज दुनिया भर में जापान अपने देश की 18-19वीं शताब्दियों में किए गए कृत्यों के लिए माफी मांगता रहता है। उससे उसका कद बढ़ा ही है।

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