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लेख - June 3, 2022

मोदी सरकार की आठ साला उपलब्धियों में ‘कश्मीरी पंडित’ शामिल क्यों नहीं….?

-ओमप्रकाश मेहता-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

अभी-अभी मोदी सरकार ने अपनी आठ साला शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियों गिनाई है, इन उपलब्धियों में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का तो उल्लेख अवश्य है, किंतु इस क्षेत्र की पिछले तीन दशक से चली आ रही कश्मीरी पंडितों के पुर्नव्यवस्थापन का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि यह धरती के इस ‘स्वर्ग’ की सबसे बड़ी समस्या है और इस समस्या के चलते सेकड़ों हिन्दू कश्मीरी पंडित अपनी जान गंवा चुके है, देश पर राज कर रही भारतीय जनता पार्टी ने पिछले तीन दशक हर चुनावी घोषणा-पत्र में इस मुद्दें को शामिल किया है, 2014 के चुनावी घोषणा-पत्र में यह मुद्दा शामिल था, किंतु पिछले आठ सालों में इस मुद्दें की सरकार ने पूर्ण रूप से उपेक्षा की, जिसके फलस्वरूप आज ‘धरती का यह स्वर्ग’ शमशान (नर्क) बनने को मजबूर है, अब तो लाचार व असहाय हिन्दू कश्मीरी पंडितो। को मजबूर होकर आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ रहा है, अब सरकार अपनी सफाई में इस वर्ग के कश्मीरियों को सिर्फ इतना आश्वस्त कर रही है कि कश्मीरी पंडितों या हिन्दू कर्मचारियों की तैनाती सिर्फ जिला मुख्यालयों पर ही होगी, उन्हें ग्रामीण या अन्य असुरक्षित क्षेत्रों में नही रखा जाएगा।

सरकार के इस आश्वासन भरे फैसले से तो यही उजागर होता है कि आतंकी हिन्दू कश्मीरियों की हत्याएं सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में ही करते है, जब कि अभी तक हुई वारदातों की सूची देखी जाए तो सत्तर प्रतिशत हत्याएं शहरी क्षेत्रों में ही हुई है और उप-राज्यपाल के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पाक आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकियों का कुछ भी बिगाड नहीं पाई है, पिछले पांच महीनों में ही तेरह हिन्दूओं की नृशंस हत्याएं की गई है, अब तो ऐसे माहौल से कश्मीरी पंडित इतने डरे सहमें है कि उन्होंने सरकार को ‘अल्टीमेटम’ दे दिया है कि ‘हमे चौबीस घंटे में कश्मीर से शिफ्ट करो, हम कैदियों की जिन्दगी नहीं जीना चाहते, यदि ऐसा नहीं किया गया तो हिन्दू कश्मीरी पंडित सामुहिक पलायन शुरू कर देगें, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी’, किंतु सरकार इनकी मांग पर गौर करने के बदले इन पर लाठियां भांज रही है, अब पूरे कश्मीर में करीब तीन दर्जन स्थानों पर सरकार व पंडितों के बीच ऐसी ही जंग छिड़ी हुई है, यहां सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जो हाल ही में आंकड़े जारी किए है उनके अनुसर 1990 से 2020 (तीस सालों में) के बीच आतंकवाद के चलते 65 हजार कश्मीरी पंडितों को अपना मूल निवास स्थान त्याग कर सुरक्षित जगह अपना सिर छिपाना पड़ा है।

अब सरकार तथा केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टीकी मुख्य चिंता यह है कि ऐसे माहौल में जम्मू कश्मीर राज्य विधानसभा के चुनाव कैसे करवाए जाएं और वहां केन्द्र का शासन (उप-राज्यपाल की सरकार) कब तक जारी रखा जाए? हाल ही में केन्द्र द्वारा राज्य के करवाए गए गोपनीय सर्वे में भी यही सामने आया है कि फिलहाल जम्मू कश्मीर में माहौल चुनाव के लायक तो कतई नहीं है, जबकि सरकार की चुनाव कराने की संवैधानिक मजबूरी है, भाजपा नेतृत्व की महत्वकांक्षा जम्मू कश्मीर विधानसभा पर कब्जा करने की है इसी विचार को दृष्टिगत रखते हुए परिसीमन आयोग से सीटें बढ़वाने की मशक्कत कराई गई, अब जम्मू में 43 तथा कश्मीर में 47 सीटें हो गई है, कुल मिलाकर 90 सीटों में से बहुमत के लिए भाजपा को कम से कम 46 सीटें चाहिए, राज्य विधानसभा के विगत चुनाव में कश्मीर से भाजपा का मात्र एक सीट मिल पाई थी, जबकि जम्मू की अधिकांश सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, फिर भी भाजपा वहां अल्पमत में ही रही थी, अब भी वही समस्या है, आम कश्मीरी धारा 370 के खात्में का दर्द अभी भुला नहीं पाया है और चूंकि कश्मीर में जम्मू के मुकाबले 4 सीटें अधिक है, इसलिए यहां भाजपा का सपना तो अभी पूरा हो सकता है, जब जम्मू की सभी सीटों पर भाजपा का कब्जा हो और आधा दर्जन सीटें उसे कश्मीर से मिले? और यह असंभव सा प्रतीत हो रहा है, क्योंकि वहां मोदी विरोध के नाम पर सभी स्थानीय राजनीतिक दल एकजुट हो गए है और सभी ने एकजुट होकर भाजपा के मुकाबले की तैयारी कर रखी है।
इस चुनावी जमा-खर्च के साथ भाजपा की एक बड़ी चिंता यह भी है कि धीरे-धीरे पाकिस्तान का दखल कश्मीर में बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों के कारण आम कश्मीरी की सहानुभूति पाकिस्तान के प्रति बढ़ती ही जा रही है, अब आज एक ओर जहां भारत सरकार पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को हथियाने के प्रयास कर, आए दिन नई चाले चल रही है वही पाकिस्तानियों ने कश्मीरियों के दिल-दिमाग पर इतना कब्जा कर रखा है कि यदि आज आम जनभावना का सर्वे करवाया जाए तो कश्मीरियों का बहुमत पाक के पक्ष में ही होगा इसलिए कश्मीर को लेकर मोदी सरकार काफी परेशान व दुविधा में है, जिसका हल उसे मिल नहीं पा रहा है।

 

 

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