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लेख - June 3, 2022

पंजाब सरकार की विफलता व केजरीवाल

-कुलदीप चंद अग्निहोत्री-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

पंजाब में बहुत मुश्किल से पाकिस्तान की साजि़श को नाकाम करते हुए शांति स्थापित हुई थी। लेकिन अराजकता के उस दौर में इस शांति स्थापना के लिए हज़ारों लोगों को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा था। पंजाब को पुनः अशांति के दौर में धकेलने के लिए तत्पर बैठी देसी और विदेशी शक्तियां न तो चुप बैठी थीं और न ही चुप बैठ सकती थीं। वे केवल उचित सरकार की प्रतीक्षा कर रही थीं। इसकी चेतावनी पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने अनेक बार दी भी थी। विधानसभा के चुनाव के समय कुछ लोगों को ऐसा संशय भी था कि अराजकतावादी शक्तियां जिस उचित सरकार की प्रतीक्षा कर रही थीं, वह आम आदमी पार्टी की ही सरकार थी। लेकिन अकाली पार्टी और सोनिया कांग्रेस से लोग इतने त्रस्त हो चुके थे कि वे आकाश से गिरकर खजूर में भी अटकने को तैयार हो गए थे। और लगता है पंजाब सचमुच खजूर में अटक गया है। यह तब होता है जब सरकार जनहित व राष्ट्र हित की बजाय दलहित को ध्यान में रखना शुरू कर देती है। आम आदमी की अवधारणा है कि पंजाब में अपराधियों के गैंग पैदा करने और उन्हें प्रश्रय देने के लिए अकाली दल जि़म्मेदार है। इनकी उत्पत्ति भी कहीं न कहीं पंजाब के नशा माफिया से जुड़ी हुई है। कांग्रेस ने अपने राज में नशा तस्करों व गैंग कल्चर को नियंत्रित करने की बजाय उससे अपने दलहित साधने शुरू कर दिए।

पंजाब के जनमानस में उपजी इसी निराशा और विवशता का लाभ उठाकर आम आदमी पार्टी सत्ता के शिखर पर पहुंची है। लेकिन केजरीवाल पंजाब की इस सत्ता का उपयोग देश के दूसरे हिस्सों में सत्ता प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं। यही कारण है कि वह पंजाब में भी दिल्ली की तरह नौटंकी करके अपने हित साधने में लगे हुए हैं। पंजाब में दिन प्रतिदिन बिगड़ रहे हालात को देखकर लगता है कि अराजकतावादी-अलगाववादी ताक़तों को आम आदमी पार्टी की सरकार अपने अनुकूल लगती है और आम आदमी पार्टी को पंजाब में अराजकता का माहौल अपने अनुकूल लगता है। यही कारण है कि केजरीवाल ने बहुत ही सावधानी से मंत्रिमंडल में केवल उन लोगों को स्थान दिया है, जिन्हें आम पंजाबी नौसिखिया मानता है। एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा।

कुंवर विजय प्रताप सिंह कुछ महीने पहले तक पंजाब पुलिस के मुखिया थे। अपनी ईमानदारी और दियानतदारी के लिए वे जाने जाते हैं। अपने इन्हीं गुणों के कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका पंजाब की कांग्रेसी सरकार पर आरोप था कि वह जानबूझकर अपने सियासी मुफाद के लिए पंजाब में शांति स्थापित नहीं होने देना चाहती। उनको लगा राजनीति में आकर वे इस हालात को बदल सकते हैं क्योंकि इसी से वे आदेश का पालन करने की स्थिति से आदेश देने की स्थिति में आ जाएंगे। इसके लिए उन्होंने केजरीवाल का पल्ला पकड़ा। मुझे उस वक्त भी लगा था कि वे केजरीवाल को पहचानने में भारी भूल कर रहे हैं क्योंकि मैं मानता था कि केजरीवाल की रणनीति पंजाब को अराजकता से निकालने की बजाय उसे अराजकता के दलदल में धकेलने की ज्यादा रहेगी। अन्ना आंदोलन के दिनों में केजरीवाल स्वयं मंच से घोषणा किया करते थे कि वे अराजकतावादी हैं।

यही कारण है कि उन्होंने पंजाब मंत्रिमंडल से कुंवर विजय प्रताप सिंह को बाहर रखा। दिन प्रतिदिन अराजकता की ओर बढ़ रहे पंजाब में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुंवर को गृह मंत्रालय देना चाहिए, ऐसी आवाज पंजाब में सभी ओर से आ रही है, लेकिन केजरीवाल ऐसा नहीं होने देंगे। केजरीवाल की रणनीति साफ है। पंजाब में अराजकता फैलाकर उसकी जि़म्मेदारी केन्द्र सरकार के गले में डाल सकते हैं। आने वाले चुनाव के दिनों में वे इसका उपयोग अन्य राज्यों में वोट मांगने के लिए कर सकते हैं। लेकिन यहां केजरीवाल एक भयंकर भूल कर रहे हैं। पंजाब, दिल्ली नहीं है। पंजाब की समस्याओं के लिए दिल्ली को जि़म्मेदार ठहराना इतना आसान नहीं होगा। पंजाब में यदि हालात और भी ख़राब होते हैं तो उसका दबाव अंततः केजरीवाल की गर्दन को ही झेलना पड़ेगा। पंजाब में आम लोगों को यह लगने लगा है कि केजरीवाल ने अपनी ही पार्टी के क़द्दावर नेताओं को मंत्रिमंडल से इसलिए बाहर रखा है क्योंकि उसको डर है कि अपने पैरों पर खड़े इस प्रकार के नेता उसके चरणों में बैठकर नहीं बल्कि उसके बराबर खड़े होकर बात करेंगे। लेकिन केजरीवाल को तो पंजाब प्रशासन का दुरुपयोग करके देश भर में अपने विरोधियों को सबक़ सिखाना है। यही कारण है कि देश भर में कोई भी आदमी फेसबुक पर भी केजरीवाल के बारे में कोई टीका टिप्पणी करता है तो पंजाब की पुलिस उसे घर से उठा लाती है। कुंवर विजय प्रताप सिंह इस प्रकार से पुलिस का दुरुपयोग नहीं होने देंगे, ऐसा केजरीवाल भी जानते हैं। यही कारण है कि कुंवर सड़कों की ख़ाक छान रहे हैं और अराजकतावादी पंजाब में हत्याओं में मशगूल हैं। केजरीवाल ने पंजाब में चार-पांच सौ लोगों की सुरक्षा वापस ली है। ऐसा उसे अधिकार है। यदि सरकार के पास ऐसी सूचनाएं हैं कि अमुक व्यक्ति की जान को कोई ख़तरा नहीं है और उसने पुलिस सुरक्षा केवल तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए मिल मिलाकर ले रखी है तो उसे हटाना ही चाहिए।

सुरक्षा देना और सुरक्षा वापस लेना एक संवेदनशील मामला है। परंतु केजरीवाल के लिए इसकी इतनी ही संवेदनशीलता बची है कि उसे इस फैसले से वाहवाही चाहिए। यदि ऐसा न होता तो सुरक्षा हटाने को लेकर इतना प्रचार न किया जाता। जिन व्यक्तियों की सुरक्षा हटाई गई, उनके नामों का मीडिया में इस प्रकार प्रचार-प्रसार किया गया, मानो यह भी सरकार की उपलब्धियों का सरकारी विज्ञापन हो। परोक्ष रूप से यह आतंकवादियों को सूचना नहीं थी कि भाई लोगों हमने फलां-फलां व्यक्ति को सुरक्षाविहीन कर दिया है, आगे आप जानो और आपका काम जाने। सूचना शायद सही ढंग से पहुंच गई थी और दूसरे ही दिन कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ चुके पंजाब के एक जाने-माने गायक को गोलियों से भून दिया गया। केजरीवाल ने इसी प्रकार की एक और नौटंकी पंजाब में की। पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री डा. विजय कुमार सिंगला को मंत्रिमंडल से बर्खास्त ही नहीं किया, बल्कि उसे गिरफ्तार भी कर लिया गया। भगवंत सिंह मान का कहना है कि उसके पास सबूत हैं कि मंत्री ठेकेदारों से पैसा मांग रहा था। यक़ीनन ऐसा ही हुआ होगा। मुख्यमंत्री ने उसे सही ही हटाया और जेल में भी पहुंचा दिया। यह अलग बात है कि सिंगला पिछले दस साल से पार्टी में सक्रिय था, लेकिन इतने साल में भी केजरीवाल सिंगला की तबीयत को पहचान नहीं पाए। परंतु सिंगला की सार्वजनिक बलि क्या सचमुच भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ही दी गई, या यह भी संगरूर लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव को ध्यान में रखते हुए किया गया एक स्टंट ही है? यह मात्र स्टंट है, इसका सबूत कुछ दिन बाद ही मिल गया।

सिंगला के गिरफ्तार होने के कुछ दिन बाद ही दिल्ली प्रशासन के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को पैसे की तस्करी के आपराधिक मामलों में गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर एफ आईआर पुरानी है और जांच चल रही थी। लंबी जांच के बाद उनकी गिरफ़्तारी हुई। लेकिन केजरीवाल का कहना है कि पंजाब का विजय कुमार सिंगला दोषी है और दिल्ली का सत्येन्द्र जैन बेक़सूर है, जबकि दोनों पर मामला चल रहा है। ऐसा क्यों? क्योंकि डा. सिंगला की बलि से केजरीवाल की छवि चमकती है और संगरूर लोकसभा के चुनाव में पार्टी को लाभ होगा, लेकिन जैन के पकड़े जाने पर वह केजरीवाल के अनेकों भेद खोल सकता है। ज़ाहिर है केजरीवाल अपने सत्ता विस्तार के अभियान में पंजाब को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिलेगी, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन अपने इस प्रयोग में वे पंजाब को पुनः अराजकता के दलदल में धकेल देंगे, इसमें कोई शक नहीं। पिछले दो महीनों में ही जिस प्रकार पंजाब में गैंगवार शुरू हुआ है, दिन-दिहाडे़ हत्याएं हो रही हैं और अलगाव के स्वर तेज हो रहे हैं, वह निश्चय ही चिंताजनक है।

 

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