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काबुल में आतंकी हमला

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में सिखों के एक पवित्र गुरुद्वारे पर फिदायीन हमले ने डरावना सच साकार कर दिया कि अफगानिस्तान अब भी आतंकवाद का केंद्रीय अड्डा है। तालिबान द्वारा हुकूमत कब्जाने के करीब 10 महीने बाद भी आतंकी हमले जारी हैं। मध्यकालीन मानसिकता के तालिबान, दरअसल, अल्पसंख्यकों और औरतों के प्रति दुश्मनी और नीचा दिखाने का भाव रखते हैं, लिहाजा अफगान सिख और भारत आने के इच्छुक अफगान नागरिक ही तालिबान के लगातार निशाने पर रहे हैं। जब काबुल पर तालिबान का कब्जा नहीं हुआ था, तब 2018 में जलालाबाद में एक फिदायीन हमले में 18 सिख मार दिए गए थे। 2020 में काबुल के ही एक अन्य गुरुद्वारे में आतंकी हमला किया गया, जिसमें 25 सिखों की जान गई। रविवार के हमले और पिछले दोनों हमलों की जिम्मेदारी ‘इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रॉविंस’ ने ली है। यह संगठन आईएसआईएस का अफगान अध्याय भी है और अपनी अलग धमक भी रखता है। उज़बेक, चेचन, उइग़र के अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन भी खोरासन इलाके के आतंकी संगठन से जुड़े हैं। अफगान हुकूमत में गृहमंत्री की हैसियत रखने वाले शख्स के आतंकी ‘हक्कानी ग्रुप’ के भी संपर्क और संबंध खोरासन गुट से रहे हैं। इनमें ज्यादातर तालिबान ही हैं। कुछ नाराज़ और असंतुष्ट तालिबान ने खोरासन इलाके के आतंकी संगठन को बुना है।

जब तालिबान अमरीका और अफगान फौज के खिलाफ लड़ रहे थे, तब भी खोरासन गुट का नाम उभरा था, लेकिन उसे ‘हक्कानी ग्रुप’ का एक अदद मोर्चा करार देते हुए मुद्दा दबा दिया गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मॉनीटरिंग टीम की एक रपट में खुलासा किया गया है कि अफगानिस्तान में अल कायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद सरीखे दुर्दान्त आतंकी संगठन भी सक्रिय हैं। यकीनन काबुल में आतंकियों की ही हुकूमत है। वैश्विक संगठन इसके खिलाफ कोई कार्रवाई आज तक नहीं कर पाए हैं, यह विवशता समझ के परे है। तालिबान की हुकूमत के बाद भारत सरकार ने उन लोगों के लिए ई-इमरजेंसी वीजा की व्यवस्था की शुरुआत की, जो भारत आना चाहते थे, लेकिन गति इतनी मंथर रही कि दिसंबर, 2021 तक करीब 200 आवेदनों को ही वीजा देने को मंजूरी दी गई। हालांकि इस फिदायीन हमले के बाद अफगान सिखों, हिंदुओं और वहां के नागरिकों को भारत सरकार ने करीब 160 ई-इमरजेंसी वीजा मुहैया कराए हैं। कुल मिलाकर भारत सरकार की यह कमजोर और ढीली नीति रही है। बीते दो दशकों के दौरान अफगानिस्तान में, भारत के विभिन्न प्रयासों से, अफगान लोगों में भारत की साख बढ़ी है, लेकिन इसी तरह फिजूलखर्ची से पाकिस्तान और चीन को ही फायदा होगा। एक और गंभीर समस्या है। दोनों देशों के बीच हवाई उड़ानें काफी कम हैं।

वे अनियमित भी हैं। गैर-रक्षा उड़ानों के लिए अफगानिस्तान का वायु-मार्ग पिछली 16 अगस्त, 2021 से बंद है। यदि किन्हीं को अफगानिस्तान से बाहर निकालना हो या कोई आपातकालीन कारण हो, तो विशेष उड़ानों के लिए तालिबान हुकूमत से इज़ाज़त लेनी पड़ती है। यह पर्याप्त नहीं है। चूंकि दोनों देश अब आधिकारिक तौर पर काम कर रहे हैं, भारत वहां भुखमरी के हालात से निपटने के लिए खाद्यान्न भेज रहा है, आर्थिक मदद भी कर रहा है, लिहाजा भारत सरकार को अधिक हवाई उड़ानों के लिए तालिबान हुकूमत से आग्रह करना चाहिए। इसके अलावा, भारत सरकार को अफगान नागरिकों, छात्रों और हमारी पृष्ठभूमि के हिंदुओं, सिखों के लिए ई-इमरजेंसी और मेडिकल वीजा की व्यापक स्तर पर शुरुआत करनी चाहिए। अफगान छात्र भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ सकेंगे, यह बात अफगान सरकार को समझानी पड़ेगी। हालांकि अब वहां पहले जैसी पाबंदियां नहीं हैं। भारत के अफगानिस्तान में रणनीतिक हित भी सधने चाहिए, तभी उनकी मदद करने की सार्थकता होगी। आतंकवाद की दृष्टि से अब खोरासन गुट अपेक्षाकृत कमजोर पड़ रहा है। ‘हक्कानी नेटवर्क’ का सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी तालिबान की हुकूमत में गृहमंत्री है और उसके पाकिस्तान के साथ अंतरंग रिश्ते बताए जाते हैं, लिहाजा सरकार के स्तर पर भी तालिबान हुकूमत को समझाया जाए कि कमोबेश भारत की पृष्ठभूमि वाले समुदायों पर आतंकी हमले न कराए जाएं। आतंकियों को भी ऐसे ही निर्देश दिए जाएं।

 

 

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