कारगिल युद्ध के बाद सशक्त भारतीय सेनाएं
-सुखदेव सिंह-
-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-
कारगिल युद्ध में जहां कई वीर सपूतों को हमने खोया, वहीं इसी युद्ध से सीख लेकर भारत ने अपनी सीमाओं पर सुरक्षा और अधिक बढ़ाने पर जोर दिया था। आज हमारी तीनों सेनाएं इतनी मजबूत हैं कि पड़ोसी देशों को करारा जवाब दे सकती हैं। भारत-पाकिस्तान की सेनाओं में सन् 1999 में कारगिल युद्ध हुआ जो करीब 60 दिनों तक चला। भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुतियां देकर इस युद्ध पर विजय पाई। इसी कारण 26 जुलाई का दिन देश में कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले रणबांकुरों को इस दिन श्रद्धांजलि देकर उनके बलिदान को स्मरण किया जाता है। भारत का लोहा आज विश्व के अन्य देश भी मान रहे हैं जो कि हर्ष का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्व के कार्यकाल में विश्व के कई देशों की यात्राएं करके भारत के अन्य देशों के साथ मित्रता संबंध बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। इन देशों के साथ घनिष्ठ संबंध बनने के कारण ही उनके साथ व्यापारिक समझौते भी हुए हैं। किसी भी देश के साथ जब तक मैत्रीपूर्ण संबंध प्रगाढ़ नहीं बनते, तब तक व्यावसायिक बन पाना मुश्किल होता है। आज वही देश भारत की विदेश नीति से फलीभूत होकर कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं। हमारे देश की जनता अपने वीर सैनिकों पर अत्यधिक विश्वास करती है।
अटूट विश्वास क्यों न किया जाए, जब आम जनमानस अपने घरों में सुकून की नींद सोते हैं, तब ये वीर पुरुष सरहदों पर पहरा दे रहे होते हैं। यही वजह है कि कुछ ग्रामीण मंदिरों में भगवान की भांति शहीदों की तस्वीरें लगाकर उनकी भी पूजा की जाती है। लोग ऐसे गांवों को शहीदों का गांव कहकर भी पुकारते हैं। देश का कुल 16500 किलोमीटर का एरिया पड़ोसी देशों की सीमाओं के साथ लगता है। सीमा प्रबंधन के अभाव में हमेशा ही सावधानी हटी और दुर्घटना घटी जैसी स्थिति बनी रहती थी। देश की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार आदि देशों के साथ लगती हैं। दुश्मन हमेशा ही अपने देश की सीमाओं को लांघकर घुसपैठ करने की फिराक में रहता आया है। भारत भौगोलिक दृष्टि से भी बड़ा होने के कारण अक्सर सीमाओं की सुरक्षा बढ़ाने में कई चुनौतियों का सामना करता रहा है। अब देश ने भौगोलिक, हवाई और समुद्री सीमाओं पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर रखे हैं। 3141 किलोमीटर का एरिया पाकिस्तान के साथ लगता है जिसमें कश्मीर के हिस्से में हमेशा ही तनाव की स्थिति रहती आई है। केंद्र सरकार ने देश की सरहदों की सुरक्षा अत्यधिक बढ़ाए जाने को लेकर कारगिल युद्ध के बाद एक सुरक्षा कमेटी का भी गठन करके रखा हुआ है। भारत का अधिकांश बजट सुरक्षा के नाम पर खर्च किया जा रहा है। अपने देश में पड़ोसी देश अब घुसपैठ करने के लिए अपना अंजाम सौ बार सोचकर ही कोई कदम उठाएगा। केंद्र सरकार को अपनी सीमाओं पर चौकसी और बढ़ाकर सीमापार से आ रहे ड्रग्ज पर भी नकेल कसने की जरूरत है। दक्षिण एशिया के आठ देश अगर एकजुट हो जाएं तो बड़ी आसानी से हर समस्या पर नकेल कस सकते हैं।
सार्क अधिवेशनों में वैसे हर साल आपसी मेल-मिलाप और भाईचारा बढ़ाए जाने की सिर्फ चर्चाएं की जाती हैं। भारत ने अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश की मदद करके हमेशा ही बेहतरीन पड़ोसी देश होने का अपना दायित्व निभाया है। द्वितीय विश्व युद्ध में हुए नरसंहार ने विश्व को कई भागों में बांट दिया। दक्षिण एशिया के देशों में पड़ोसी देश पाकिस्तान हमेशा ही अपने मन की करता आया है। यही एकमात्र वजह है कि आज दक्षिण एशिया के देश महंगाई, बेरोजग़ारी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसी कई समस्याओं से घिरे हुए हैं। उधर पश्चिमी साम्राज्यवाद की नीति ने खलल डाला कि एक अमीर पश्चिमी और दूसरा उत्तरी गरीब पश्चिमी देश बन गया। विश्व देश अब अपनी जनता की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहकर बजट आंखें बंद करके खर्च करने लग पड़े। जो बजट जनता के विकास पर खर्च किया जाना चाहिए था, अब वही आधुनिक तकनीक के हथियारों को खरीदने और दूसरे सुरक्षा के इंतजाम किए जाने पर खर्च किया जा रहा है। वर्तमान समय में पड़ोसी देश चीन के सहारे भारत की सीमाओं पर घुसपैठ बढ़ाने की फिराक में मशगूल है। भारत और चीन सीमा विवाद की वजह से चीन की मोबाइल एप्लिकेशन को केंद्र सरकार ने बंद कर दिया था। भारत की इस पहल पर अन्य देश भी अमल कर रहे हैं। यह भी एक तरह भारत-चीन की अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाकर अपनी कूटनीति का सबूत दे रहा है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाकर भी भारत ने आतंकवाद के खिलाफ बिगुल फूंका है।
केंद्र सरकार प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण जम्मू-कश्मीर को पर्यटन का बेहतरीन स्थल बनाने के लिए प्रयासरत है। इस राज्य के विकसित होने के बाद इसका सम्पूर्ण विकास संभव है। जम्मू-कश्मीर के मॉडल राज्य बनते ही आतंकवादी गतिविधियों में भी कमी आएगी, ऐसी मंशा ही केंद्र सरकार की है। भारत बहुत जल्द जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक बैठक करने जा रहा है जिसमें जम्मू-कश्मीर का कायाकल्प किया जाना प्रमुख उद्देश्य रहेगा। भारत जम्मू-कश्मीर को व्यापारिक हब बनाकर वहां की जनता के लिए रोजगार के साधन सृजित करने वाला है। जम्मू-कश्मीर पर अपना आधिपत्य जमाने वालों के लिए यह करारा जवाब होगा। पड़ोसी देश की बजाय कल तक मित्र देश नेपाल भी विरोधी स्वर दिखा रहा था। भारत पर अटूट विश्वास रखने वाले नेपाल को भी चीन ने अपने रंग में फिलहाल रंग लिया था। नेपाल भारत का कुछ हिस्सा अपना बताकर तनावपूर्ण स्थिति बनाए हुए था। ठीक यही वजह है कि नेपाल में महंगाई चरम सीमा में बढ़ गई। नेपाल की अधिकांश जनता आज भी भारत की समर्थक है जो कि अपनी सरकार के इस ऐलान का विरोध कर रही है। चीन ने श्रीलंका, नेपाल का समर्थक बनकर क्या खेल खेला, अधिकांश जनता अब जान चुकी है। पड़ोसी देश पाकिस्तान की जनता भी चीन की मददगार नीति को जान रही है। दक्षिण एशियाई देशों में भारत से बड़ा कोई और मददगार नहीं हो सकता, यह बात सभी को स्मरण रखनी होगी। आज केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर पड़ोसी देश का मीडिया उसकी खूब प्रशंसा करता है। पड़ोसी देश की जनता भी अगर नरेंद्र मोदी की कायल होती जा रही है तो यह उनके कुशल नेतृत्व का नतीजा है। बहरहाल कारगिल के योद्धाओं को नमन है। सेनाओं का सशक्त होना हर्ष का विषय है।
प्रकाश उइके बने भारतीय आदिमजाति सेवक संघ के नए अध्यक्ष
*आदिवासियों के लिए बनाएंगे लीगल सेल आदिवासियों में जागी एक नई उम्मीद दिल्ली | ( सहिल गौड़ …








