हिंदू विरोध जोड़ेगा भारत?
-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-
कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का मकसद कुछ भी हो सकता है। वह समकालीन, समस्यापरक, सामुदायिक, सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर आधारित हो सकती है। कांग्रेस के आलाकमानी नेता राहुल गांधी ने किसानों, मजदूरों, छात्रों-युवाओं, महिलाओं आदि से मिल कर संवाद किए हैं। उन्हें कांग्रेस के संकल्पों से जोडऩे की कोशिश की है। यात्रा पर राजनीति करना स्वाभाविक है। उस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन राहुल गांधी ने एक विवादास्पद, सजायाफ्ता और जेल जा चुके पादरी से मुलाकात की और भगवान, धर्म पर उसकी व्याख्या सुनी, तो आपत्ति उन व्याख्याओं पर है। पादरी जॉर्ज पोनैया अपनी आध्यात्मिक आस्था के आधार पर ईसा मसीह को ‘एकमात्र भगवान’ मान सकते हैं, लेकिन भारतीय और सनातन संस्कृति और प्राचीनतम आस्थाओं को खंडित नहीं कर सकते। संविधान के मुताबिक, वह अपराध है। हमारी संस्कृति, सभ्यता और आध्यात्मिकता सबसे प्राचीन और मानवीय है। हमारी संस्कृति में जो अवतार हैं, वे साक्षात ब्रह्म हैं। बेशक मानव-रूप में मानवोचित लीलाएं करना स्वाभाविक हैं। भारतीय और हिंदू संस्कृति और सभ्यता ही एकमात्र ऐसी है, जहां ईश्वरीय सत्ता में ‘स्त्री’ भी मौजूद है। वह ‘शक्ति’ और ‘भगवती’ का प्रतीक है। बल्कि ‘स्त्री’ को पहला स्थान दिया गया है।
मसलन-सियाराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण और माता-पिता आदि। राहुल गांधी भी चुनावों के दौरान ‘हिंदू’ या खासकर ‘शिव-भक्त’ का स्वांग रचते रहे हैं। कमोबेश उन्हें हिंदू संस्कृति में देवी-देवताओं, शक्ति या भगवान के अस्तित्व और उनके चमत्कारों की कुछ तो जानकारी होगी! शेष अन्य संस्कृतियों और सभ्यताओं में भगवान की कल्पना सिर्फ ‘पुरुष’ में ही की गई है। सवाल यह है कि कांग्रेस का मकसद कुछ और होता है तथा कांग्रेसी भटकते हुए किसी विवादित दर पर पहुंच जाते हैं। फिर जो भी आध्यात्मिक व्याख्या उनके सामने की जाती है, उस पर वे जिज्ञासु की तरह पूछते हैं-‘क्या ऐसा ही होता है? क्या यही सही है?’ कैथोलिक पादरी ईसा मसीह को ही ‘असली भगवान’ मानें, लेकिन वह हिंदू-विरोधी और अपमानजनक टिप्पणियां कैसे कर सकते हैं? और राहुल गांधी तथा सभी संबद्ध कांग्रेसी ऐसी टिप्पणियां बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं? क्या ऐसी ही टिप्पणियों के सहारे भारत एकजुट होकर जुड़ेगा? क्या कांग्रेस की यात्रा काा मंतव्य यही है? ऐसी हिंदू-विरोधी व्याख्याओं से कांग्रेस को राजनीतिक हासिल क्या होगा? राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, पार्वती, काली माता आदि दैवीय भगवान अरबों हिंदू और सनातन आस्थावानों के ‘आराध्य’ हैं। उनकी आस्था और विश्वास को कैसे तोड़ा जा सकता है? और एक पादरी उसे मिथ्या तथा बेबुनियादी करार कैसे दे सकता है? ऐसी विद्वत्ता और ज्ञान पादरी ने कहां से हासिल किया? उसने तो देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और द्रमुक नेता के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया था। उसे अपराधी माना गया, लिहाजा पादरी को जेल में भेजा गया।
जब उसने सार्वजनिक माफी मांगी, तो सजा कम की गई और उसे जेल से रिहा किया गया। पादरी ने कौन से वेद, पुराण, उपनिषद्, प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त किया है कि वह भारतीय देवी-देवों और भगवान की सत्ता को खारिज कर रहा है? दिलचस्प है कि कांग्रेस ने ऐसी विवादित टिप्पणी को ‘भारत का बहुलतावाद’ करार दिया है। इस प्रकरण पर भाजपा का राजनीतिक रुख क्या होगा और वह कैसे प्रहार करेगी, उससे हमारा ज्यादा सरोकार नहीं है। चूंकि कांग्रेस ने ‘भारत जोड़ो’ के दावे पर यात्रा की शुरुआत की है और शुरू में ही विवाद पैदा किए जा रहे हैं, तो प्रथम जवाबदेही कांग्रेस की ही है। हम तो शुरू से मान रहे हैं कि यह देश अखंड और एकजुट है, विभाजन की कोई गुंज़ाइश नहीं है, लेकिन ऐसे पादरियों या धर्मगुरुओं के पास जाकर कांग्रेसी धार्मिक प्रवचन सुनेंगे, तो उससे देश में जातीय और धर्म-मत की दरारें पैदा जरूर हो सकती हैं। कांग्रेस पुराने तथ्य परोस रही है या महंगाई, बेरोजग़ारी, गरीबी के आंकड़े गिनवा रही है, लेकिन राहुल गांधी को याद दिलाना चाहिए कि वह तो गरीबी को महज एक ‘मनोदशा’ मानते रहे हैं। भारत को ‘राष्ट्र’ ही नहीं मानते, ऐसा भाषण तो उन्होंने संसद में ही दिया था। बहरहाल इन तमाम बिंदुओं को छोड़ भी दें, तो यह पादरी वाला प्रसंग बेहद नाजुक है। कांग्रेस इन संवेदनाओं से खेलने के लिए यात्रा का ढोंग नहीं कर सकती। भारतीय संस्कृति और आस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी भी शख्स को नहीं दी जा सकती है।
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