थरूर का गुरूर और खड़गे के खेवैया
-अनिल बिहारी श्रीवास्तव-
-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-
शशि थरूर की प्रशंसा इस बात के लिए की जानी चाहिए कि तमाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मनोवैज्ञानिक दबावोंके बावजूद वह कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में डटे हुए हैं। कभी उनके साथ जी 23 में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखते रहे आधा दर्जन दोस्त पाला बदल चुके हैं। उनमें से कुछ तो मल्लिकार्जुन खड़गे के समक्ष नत्मस्तक मुद्रा में हैं। कुछ यहां-वहां दुबके गए। कुछ दरबारी कांग्रेसियों ने भविष्यवाणी कर दी है कि खड़गे ही पार्टी के नए अध्यक्ष होंगे। वजह खड़गे को गांधी परिवार का मौन समर्थन है। थरूर भी इस सच को समझ रहे हैं। हफ्ताभर पहले थरूर का एक बयान सुर्खियों में रहा। उन्होंने कहा, खड़गे कांग्रेस के भीष्म पितामह, लेकिन मेरे पास विजन है। जो लोग कांग्रेस में यथास्थिति चाहते हैं वो खड़गे को वोट दें।
थरूर ने खड़गे को निरंतरता बनाए रखने वाला उम्मीदवार बताकर इशारा किया कि उन्हें गांधी परिवार का समर्थन मिल चुका है। वह आगे कहते हैं, ‘मेरे पास पार्टी को मजबूत करने का विजन है, जो बदलाव लाएगा।‘ थरूर की टिप्पणी कितने कांग्रेसियों को समझ आई? उनके शब्दों पर कितने लोगों ने मनन किया? ईश्वर ही जानें पर यह स्वीकार करना होगा कि थरूर ने गहरी बात की है। निष्पक्ष विश्ल्ाषकों का मानना है कि खड़गे का राजनीतिक अनुभव भले ही काफी है लेकिन थरूर जैसा स्पष्ट नजरिया उनमें नजर नहीं आता। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़गे की सबसे बड़ी योग्यता क्या है? गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा कहें तो क्या गलत होगा? एक माह पूर्व तक निष्ठावान कांग्रेसियों में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सबसे आगे दिखते थे। राजस्थान के कांग्रेसी विधायकों के शक्ति प्रदर्शन के बाद गहलोत का ग्राफ गोता लगा रहा है। दूसरी ओर, थरूर का राजनीतिक अनुभव खड़गे के मुकाबले काफी कम है। उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका अध्ययन, विभिन्न विषयों की समझ और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त पहचान को मानना चाहिए।
पार्टी अध्यक्ष पद के मुकाबले की स्थिति साफ होने के बाद थरूर ने अपने प्रतिद्वंद्वी खड़्रगे के साथ सार्वजनिक बहस का प्रस्ताव रखा था। थरूर का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के दोनों उम्मीदवारों के बीच बहस से पार्टी के प्रति लोगों में उसी तरह की दिलचस्पी पैदा होगी जैसी ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी के नेता के चुनाव को लेकर हुई थी। इससे वोट डालने वाले डेलीगेट्स को अपना मन बनाने में मदद मिलेगी। थरूर के इस प्रस्ताव को खड़गे ने चतुराई से नामंजूर कर दिया। उन्होंने जवाब दिया, हम दोनों एक ही परिवार से हैं अत: इस तरह की बहस की कोई जरूरत नहीं है। हम दोनों को आपस में नहीं लड़ना चाहिए है क्योंकि हमारी लड़ाई भाजपा के खिलाफ है। थरूर का प्रस्ताव उनकी नीतियों और योजनाओं के प्रति उनके आत्मविश्वास का प्रतीक है। वह महसूस कर रहे हैं कि भले ही गांधी परिवार के मौन समर्थन के चलते खड़गे की स्थिति बहुत से लोगों को मजबूत लग रही हो परंतु किसी सार्वजनिक बहस का अवसर मिलने पर अपने ज्ञान से वह खड़गे का पसीना छुड़वा सकते हैं।
थरूर स्वीकार करते हैं कि पार्टी की वर्तमान स्थिति बहुत चिंताजनक है। वर्तमान संगठनात्मक ढांचे पर समय देने से बेहतर होगा कि नए नजरिये के साथ शुरुआत की जाए। दूसरी ओर, पचास सालों के अनुभवधारी खड़गे साहब? संभवत: उन्हें आशंका हो कि थरूर को बहस में हॉवी होने से रोक पाना उनके वश की बात नहीं है। खड़गे पूरी तरह से गांधी परिवार के मौन समर्थन पर निर्भर दिख रहे हैं। हाल ही में एक प्रमुख दैनिक मे खड़गे का इंटरव्यू पढ़ने को मिला। वह खुले आम कह रहे हैं, ‘कांग्रेस जैसा विशाल संगठन चलाने के लिए गांधी परिवार का मार्गदर्शन जरूरी है। यदि, कोई कहता है कि उन्हें छोड़ कर पार्टी को चलाया जा सकता है तो यह असंभव है।‘ खड़गे से इस बयान से इतर किसी नए विचार की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह स्वयं जानते हैं कि उनकी नैया का खेवैया गांधी परिवार है। यह दावा सच लग रहा है कि अध्यक्ष कोई भी बने कांग्रेस में उसका नंबर गांधी परिवार के बाद ही आएगा। यानि, कांग्रेस अध्यक्ष कोई भी बन जाए, रिमोट कंट्रोल तो गांधी परिवार के पास होगा।
अपनी भारत जोड़ो यात्रा में शामिल कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का कहना है कि ‘खड़गे और थरूर दोनों का अपना कद है और दोनों ही अच्छी समझ वाले व्यक्ति हैं। उन्हें रिमोट कंट्रोल से नहीं चलाया जा सकता। इन दोनों के बारे में रिमोट कंट्रोल की धारणा उनके प्रति अपमानजनक बात है।‘ क्या राहुल गांधी की बातों में धेले भर दम महसूस होती है? बरबस ही ग्रामीणों क्षेत्रों प्रचलित एक मुहावरा याद आ गया, ‘नउआ-नउआ बाल कहां?’ जल्द ही सामने आ जाएगा किसके पास रिमोट कंट्रोल है। नए अध्यक्ष के कामकाज का तरीका सब कुछ कह देगा। आरोप लगता रहा है कि डा.मनमोहन सिंह की स्थिति यूपीए सरकार के प्रतीकात्मक अगुआ जैसी थी। महान अर्थशास्त्री तक मार्गदर्शन और निर्देशों के लिए 10 जनपथ जाते थे। कांग्रेस गांधी परिवार का महत्व थरूर स्वीकार करते हैं। उनके मिजाज से वाकिफ लोगों का कहना है कि वह विनम्र हैं लेकिन विनम्रता के चलते दण्डवत मुद्रा में कभी नहीं दिखाई देंगे। गांधी परिवार इस बात को जानता है। कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की मंशा सबसे पहले थरूर ने ही व्यक्त की थी। शायद वह गांधी परिवार की पहली पसंद नहीं थे। इसीलिए गहलोत को चुनाव लड़ाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई। दिग्विजय सिंह का नाम भी चला। गांधी परिवार की पसंद के रूप में खड़गे सामने आ गए। इस चुनाव को लेकर दो तरह की भविष्यवाणियां की गईं हैं।
एक पक्ष का मानना है कि खड़गे को इकतरफा प्रचण्ड विजय मिलेगी। आखिर उन्हें गांधी परिवार का मौन समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में गांधी परिवार की निष्पक्षता कहां रह गई? अन्य पक्ष का कहना है कि थरूर को कमजोर नहीं मानना चाहिए। वह करिश्मा दिखा सकते हैं। ऐसा कोई करिश्मा गांधी परिवार के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा। लोग मान कर चल रहे हैं कि चुनाव परिणाम कुछ भी रहे किन्तु तय मानिए कि कांग्रेस को एक और बड़े झटके के लिए तैयार हो जाना चाहिए। खड़गे जीतते हैं तो निष्पक्ष चुनाव की मांग करते रहे वर्ग की नाराजगी गांधी परिवार के प्रति बढ़ सकती है। थरूर के जीत जाने पर उनके लिए काम करना मुश्किल किया जा सकता है। हो सकता है कि थरूर साहब खुद ही अध्यक्ष पद से तौबा कर लें। याद करें कि सोनिया के दरबारियों ने सीताराम केसरी को किस तरह धक्के मार कर हटाया था। गांधी परिवार ने पंजाब और राजस्थान के घटनाक्रमों से कोई सबक नहीं लिया। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को बढ़ाने के फेरे में कथित हाई कमान ने राज्य में पार्टी की लुटिया ही डुबो डाली। राजस्थान में अशोक गहलोत पर दबाव की रणनीति नाकाम साबित हुई। सबसे पहले पंजाब, फिर राजस्थान और अब कांगे्रस अध्यक्ष पद का चुनाव, पार्टी पर गांधी परिवार की कमजोर होती पकड़ की पहचान हैं।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के विचार पढ़ने को मिल। उनका कहना है कि ‘बात उन दिनों की है जब 1998 सीताराम केसरी को पदच्युत किए जाने के बाद कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में आ गई थी। उन्हीं दिनों एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंहराव ने कहा था, अब 25-30 सालों के लिए इस परिवार के हाथों में चली गई पार्टी।‘ नरसिंहराव के वचन सौ प्रतिशत सच साबित हुए हैं। गांधी परिवार ने पार्टी पर लगभग उतनी अवधि तक राज कर लिया है। खास बात यह देखने में आई कि इस दौरान कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गई। यह अलग बात है कि कमजोर होती कांग्रेस को उसका पुराना गौरव वापस दिलाने के लिए कुछ नहीं किया गया। सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सक्रियता सीमित कर ली है। राहुल गांधी के हाथों में असफलताओं का अंबार है। प्रियंका वाड्रा कुछ नहीं कर पा रहीं। अगर पूरी निष्पक्षता और तटस्थता के साथ पार्टी संगठन के हर स्तर पर चुनाव सुनिश्चित किए जाते और दरबारियों की बजाय प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ने का मौका मिलता तो आज हाई कमान को लो कमान जैसी स्थिति नहीं देखनी पड़ती। गांधी परिवार को आज स्पष्ट करना चाहिए कि वह ना तो खड़गे का समर्थन कर रहा है और ना ही थरूर का विरोध। दोनों में से जिसमें दम हो वह जीत ले यह चुनाव। कांग्रेस का भला इसी में है।
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