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लेख - October 18, 2022

हिन्दीक में चिकित्सात शिक्षा की चुनौतियॉं

-राकेश कुमार वर्मा-

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

हिन्दीक में चिकित्सात शिक्षा पाठ्यक्रम सुनिश्चित कराने के साथ ही मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है। केन्द्री य गृह मंत्री ने इस तथ्यि के पक्ष में महात्माप गॉधी के संकल्प को दोहराते हुए बताया कि मातृभाषा में शिक्षा की व्यीवस्थाे देश की सच्चीे सेवा है, इसलिए नई शिक्षा नीति के तहत क्षेत्रीय और मातृभाषा को महत्वय दिया जा रहा है। उन्हों ने आशा व्यवक्त किया कि मातृभाषा में चिकित्साय शिक्षा के अध्य यन से भारत विश्वश में शिक्षा का बड़ा केन्द्र बनेगा।
भारत एक सघन बहुभाषी देश है जहां वर्ष 2011 की जनगणना प्रक्रिया में मातृभाषाओं की संख्या‍ 19 हजार 569 दर्ज की गई। मातृभाषायी शिक्षा की वकालत के परिप्रेक्ष्‍य में कोठारी आयोग ने राष्ट्री य पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 को दोहराया था लेकिन इस दिशा में कोई निर्णायक प्रयास नही हुआ अन्यटथा 50 वर्षों बाद अब इन्हीं तथ्योंल को शिक्षा नीति में पुन: दर्ज करने की आवश्युकता नहीं होती। नीति परिवर्तन के पूर्व हमें समय की चुनौतियों को पहचानने और उनका सामना करने की तैयारियों के साथ प्रस्तु्त होना चाहिये था। चॅूंकि सरकार ने इस दिशा में सतही काम शुरू कर दिया है तो उसके सकारात्मतक परिवर्तन की आशा की जानी चाहिये।
नई शिक्षा नीति की अनुशंसाओं के साथ ही मातृभाषा से शिक्षण का प्रयास शुरू हो गया है। यह नीति अनेक उपाय सुझाती है जैसे स्था नीय भाषा में पाठ्यसामग्री का निर्माण, बहुभाषी शिक्षण की व्यनवस्थाा, केन्द्रा और राज्य् सरकारों द्वारा स्थाहनीय भाषाओं के जानकार शिक्षकों की व्य़वस्था्, क्षेत्रीय प्रोद्योगिकी का उपयोग। इसके साथ ही विज्ञान और गणित की पाठ्य सामग्री यथांसभव द्विभाषी बनाई जायेगी जिसमें एक भाषा अँग्रेजी भी होगी। निश्चित ही यह नीति भारतीय जनमानस से औपनिवेशिक पहचान को स्थाषनीयकरण के मजबूत सैद्धांतिक आधार तैयार करने में सक्षम होगी। क्योंिकि भारत में
वैज्ञानिकाश्च् कपिल: कणाद: शुश्रुस्ताथा। चरको भास्कभराचार्यो वराहमिहिर सुधी।।
नागार्जुन भरद्वाज, आर्यभट्टो वसुर्वध्‍:, ध्येरयोवेंकट रामश्चाविजा रामानुजाय:।।
को चरितार्थ करता विज्ञों की समृद्ध परम्पुरा रही है, लेकिन भूमण्डवलीकरण के इस परिदृश्या में चरक, पतंजलि और बाग्भदट्ट के पारम्पीरिक सिद्धान्तोंण का अनुकरण आसान नहीं होगा। इस संबंध में विशेषज्ञों का मानना है कि हिन्दी‍ में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चिकित्साे शब्दानवली का हिन्दीश में अनुवाद सहित अभी बड़ी तैयारियों की आवश्यसकता है। वर्तमान जारी नवीन पुस्तनकों में देवनागरी जैसे लेखन में अभी ‘र’ अक्षरों के प्रयोग को लेकर कई विसंगतियां आने की संभावना है। राज्यज सरकार ने हिन्दीभ में चिकित्साश पाठ्यक्रम तैयार करने का दायित्वस हिन्दी विश्व विद्यालय को सौंपा है लेकिन इसमें विशेषकर आदिवासी विद्यार्थियों को इसका लाभ पहुंचाने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यवकता है।
इस संबंध में देवी अहिल्याि विश्ववविद्यालय के पूर्व कुलपति डाक्टिर भरत छपरवाल की धारणा है कि विद्यार्थियों के लिए उपलब्धि क्षेत्र में अद्यतन प्रगति के साथ गुणवत्ता पूर्ण पाठ्यपुस्त के हैं। ब्रिटिश मेडीकल जर्नल और न्यूए इंग्लैंकण्डअ जर्नल जैसी गुणवत्ताभ वाली मेडीकल पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध लेखों को पाठ्यपुस्त‍कों में स्थाैन पाने के लिए न्यूसनतम चार साल लग जाते हैं। अर्थात सरकार ने इस घोषणा से पहले पर्याप्तक तैयारी नहीं की। चूंकि जापान, फ्रांस, चीन रूस जैसे देशों ने अपनी मूल भाषा में चिकित्सात शिक्षा के लिए सदियों से शोध कर एक समृद्ध पाठ्यक्रम सामग्री विकसित की है, इसलिए वहा इस प्रकार की नीति सफल है।
विविध्‍ कटिबंध और उससे प्रभावित जीवनशैली के बावजूद दुनिया एक मोहल्लेस में परिवर्तित हो गई हो तो ऐसे में चिकित्साध और सैन्यभ जैसे क्षेत्रों में एक मानक यूनिफार्म स्वंरूप सुरक्षात्मंक कवच आवश्यऐक हो जाता है। जिस प्रकार संघ की शाखा पद्धति का विश्वमभर में संस्कृरत यूनिफार्म है। इस परिप्रेक्ष्यह में भाषा की एकरूपता वाली सुरक्षात्मिक दीवार को गिराना ‘नीम हकीम खतरे जान’ जैसी विसंगतियों का नासूर बन सकती हैं। भारत जैसे देश में इसका खतरा और बढ़ जाता है। शायद इसीलिए विज्ञापन के तारतम्यन में भारतीय चिकित्साे परिषद ने जहॉं स्वाास्थ्ी‍य से संबंधित दवा के प्रति उदारता बरती वहीं उपचार संबंधी दवाओं के विज्ञापन के प्रति कठोरता दिखाते हुए उसे गैरकानूनी बताया। उदाहरण के लिए अतिअम्लजता से उत्पठन्ना उदरशूल से निजात पाने के लिए प्राय: ‘एण्टाणसिड’ दवा का उपयोग किया जाता है लेकिन इसके सहदुष्पररिणाम से होने वाले ध्व्जपतन (यंत्रयोग विकार) हमारे दाम्पयत्यक जीवन को प्रभावित करता है। वैश्वींकरण के इस युग में अंतर्राष्ट्री य प्रतिमानों के अनुरूप किसी जटिल शल्यम क्रिया पर एक देश का चिकित्समक अन्यत देश के चिकित्सककों की सहायता प्राप्तज करता है, ऐसे में यह नीति कहॉं तक कारगर होगी, कह पाना मुश्किल है।
हालांकि बाजारवाद के युग में एलोपैथी चिकित्साि विश्व के संपूर्ण अर्थतंत्र को प्रभावित करता है। भारत के बड़े बाजार पर छद्मरूपों से अभी भी यह एकाधिकार बनाये हुए है। ज्ञान अपरिमित है इसके दोहन के लिए परस्पछर अनुकरण से हम जीवन को समुन्नएत बनाते हैं लेकिन जब हम अपनी श्रेष्ठ ता सिद्ध करने के लिए अन्यम मापदण्डों की उपेक्षा करने लगें तो उससे हमारा अहंकार बढ़ता है। इसलिए आरएक्सा को यथावत रख भाषा को फासिस्टद मानसिकता के दोष से मुक्ते रखना श्रेष्यलकर होगा। चिकित्सतकों द्वारा ओपीडी पर्चों पर अँग्रेजी में लिखी दवाओं को अधिकृत भेषज्ञ नही बल्कि सरकारी स्कू।लों से यदाकदा बारहवी पढ़कर आये अपात्र व्यरक्ति ही वितरित करते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा झोलाछाप डाक्टोरों के निर्मूलन के लिए किया गया अब तक का प्रयास सर्पशिशुओं की तरह सहसा शतगुण होकर हाल ही में पनपे खांसी की दवा से मारे गये 66 अफ्रीकी बच्चोंत जैसे हश्र की पुनरावृत्ति नहीं करेगा? किसी व्याअधि के लिए हिन्दीत में लिखी दवाओं की समग्र पुनरावृत्ति के दुष्पहरिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस व्येवस्थार से चिकित्सरक और रोगी के बीच स्थांपित कल्याीणकारी विस्था्पन भंग होने से सामाजिक व्यथवस्था प्रभावित होगी।
अँग्रेजी सिर्फ सत्ता , प्रतिष्ठा न, ज्ञान विज्ञान और शिक्षा के माध्य म में नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के बाद से तो देश में यह मध्यतमवर्गीय समाज के सपनों में शामिल हो चुकी है। यही कारण है कि न्यूसनतम और द्वितीयक संसाधनों के साथ अंग्रेजी माध्येम के विद्यालय सुदूर क्षेत्रों में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे हैं। ऐसे में यह नीति इन विद्यालयों पर किस तरह बंधनकारी होगी जिससे स्थातनीय भाषाओं को प्राथमिकता मिले। क्योंयकि देश की सभी भाषायें राष्ट्री य हैं इसलिए इनका उन्नायन हमारा कर्तव्य् है। दूसरी तरफ देश में निजी विद्यालयों का बढ़ता बाजार और उन्हें पोषित करने वाले सरकारी और राजनीतिक परंपराओं ने जो परिवेश तैयार किया है उसमें भाषा और संस्कृेति से अधिक चिन्ताा पूँजी निर्माण की रही है। ऐसी स्थितियों में मातृभाषा में शिक्षण की कसौटी को किन मूल्यों पर निर्धारित किया जायेगा यह विचारणीय है। प्रसिद्ध अमरीकी मानवविज्ञानी फ्रांज बोआज ने कहा है कि अगर परंपरा के रूप में अपने ऊपर थोपी गई बेडि़यों को हम पहचान पाऍं तो ही उन्हें तोड़ सकने में समर्थ हो सकते हैं।
निश्चित ही यह नीति राष्ट्रीेय स्वाडभिमान के प्रति हमे सजग करती है लेकिन इसका अनुपालन न सिर्फ सरकारों की दृढ़ इच्छाे और दूरदकर्शिता पर निर्भर करेगा बल्कि संपूर्ण समाज को इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रतिबद्धता दिखानी होगी।

 

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