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लेख - June 22, 2021

ओलंपिक नहीं, कोरोना से बचाव जरूरी

-डा. अंजनी कुमार झा-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

पूरी दुनिया में फैली महामारी के कारण एक साल से स्थगित टोक्यो ओलंपिक को फिर अगले वर्ष से शुरू करने की कवायद के बीच चैतरफा विरोध ने आईपीएल की याद ताजा कर दी है। खेल के बहाने तमाशे से मिल रहे अकूत धन के लोभ में संक्रमण के खतरे को भुला दिया गया। चपेट में आने के कारण बड़ी संख्या में खिलाड़ी जब घर लौटने लगे, तब जाकर इसे रोका गया। ऐसे तमाशाई खेल में निवेश, लाभ के लिए सौदेबाजी को प्राकृतिक ढंग से झटके लगते हैं तो भी कृत्रिम प्रकाश और खाली स्टेडियम में भीड़ दर्शा कर चैनल पर लाइव दिखाया जाता है, ताकि विज्ञापन से भरपूर आमदनी होती रहे। जब इसी ट्रेंड को दोहराया गया तो जापान के रहवासियों के विरोध से इसे स्थगित करना पड़ा। पंद्रह हजार चार सौ ओलंपिक और पैरा ओलंपिक एथलेटिक्स, हजारों अफसर, कोच, वीआईपी और मीडिया कर्मियों की उपस्थिति से संक्रमण के बढ़ने के खतरे के मद्देनजर सरकार को जनता की आवाज सुननी पड़ी। जापान के एक बड़े समाचार पत्र और ओलंपिक प्रायोजक ‘द असाही शिंबुन’ के सर्वे के मुताबिक 83 फीसदी लोगों की राय है कि खेल को रोक दिया जाए, जबकि इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी, जापानी संगठन, अमरीका, यूरोपीय संघ और चीन इसके स्थगन के खिलाफ थे। खेल में बाजार और बाजार में खेल के कारण इसकी महत्ता बढ़ जाती है।

आईओसी को करोड़ों डॉलर के नुकसान की उम्मीद है। इसी आमदनी से हॉकी, कुश्ती, शूटिंग आदि को ऊर्जा मिलती है। जापान सरकार ने आधिकारिक तौर पर 15 बिलियन डालर व्यय किए हैं। विज्ञापनदाता, निवेशकर्ता, सरकार सभी सांसत में हैं। इससे तीन सौ बिलियन येन की क्षति का अनुमान है। टोक्यो में आयोजित हो रही ग्रीष्मकालीन गेम अब एक साल तक जबकि शीतकालीन गेम छह माह के लिए ठहर गई। तीन बार ओलंपिक चैंपियन जिमनास्ट को ही उचिमुरा सहित कई नामचीन जापानी खिलाडि़यों ने इसे देशहित के लिए स्थगित करने की गुहार लगाई। चूंकि ऐसे खेलों में केवल लाभ के लिए अरबों डॉलर का निवेश प्रोडक्ट को बाजार में स्थापित और बेचने के लिए किया जाता है, इस स्थिति में स्टेडियम में खेल प्रेमियों की तालियों की गड़गड़ाहट से अब खिलाडि़यों का मनोबल नहीं बढ़ रहा है, बल्कि जेब कितनी गरम हो रही है, मॉडल से कितनी कमाई हो रही है, इसे बाजार ने आयोजकों के जरिए बिकने वाले खिलाडि़यों के दिमाग में बिठा दिया है। आईपीएल इसका जीता-जागता उदाहरण है। सब कुछ रोबोट के जरिए हो रहा है जहां तालियां भी मशीनीकृत और कृत्रिमता से लदा रहता है। कोका कोला, वीसा समेत 14 कंपनियों ने बतौर विज्ञापन एक बिलियन डॉलर का निवेश कर रही हैं।

इस कारण ये भी इसे आईपीएल के ढर्रे पर लाने को आमादा हैं, किंतु वहां के बड़े निवेशकर्ता, सामाजिक संगठन और आमजनों के तीव्र विरोध के कारण यह टल रहा है। सरकार से जब बार-बार आयकरदाताओं और पर्यावरणविदों ने गुहार की तो आखिरकार इस पर विराम लगा। इसे महोत्सव इसलिए बनाया गया, ताकि बाजार के लिए स्पेस बनाया जा सके। अब यह उपनिवेशवाद का बायोप्रोडक्ट है। पूंजीवाद के पक्षधर इस महामारी को वामपंथ रोग कह सकते हैं। कैनेडी के जमाने में रूस का हौवा था। वर्तमान का चीन उस युग के रूस से कहीं अधिक मजबूत है। उधर जापान में जर्मन इंस्टिट्यूट फॉर जेपनीस स्टडीज के शोधकर्ता सोनिया गंसेफोर्थ ने निष्कर्ष में बताया कि विरोध जता रहे लोगों का मानना है कि 2011 में फुकुशीमा आणविक महाविपदा से ध्यान हटाने के लिए इतना बड़ा आयोजन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कुछ लोगों ने जनता की गाढ़ी कमाई का इस तरह के उपयोग को गलत बताया और कहा कि आईओसी के वोट खरीद रिश्वत कांड पर पर्दा डालने के लिए आयोजन की जिद की जा रही है। इससे पूर्व जापानी ओलंपिक कमेटी ने जब लोगों के लिए निविदा जारी की तो लोगों की दूसरी जगह से नकल का मामला तूल पकड़ा। रिश्वत के गंभीर आरोप तो लगते रहे हैं।

प्रतीक के डिजाइनर केंजिरो सानो ने इसे नहीं स्वीकारा, हालांकि सानो पर पहले भी नक़ल के कई आरोप लगते रहे हैं। टी स्टाइल की बने लोगों के असली होने का दावा बेल्जियम के ग्राफिक डिजाइनर ओलिवर देब्ले ने किया और आरोप जड़ा कि उन्होंने दी लिएजे थिएटर के लिए बनाया था। कुछ ही दिनों पूर्व जापानी ओर्गेनाईजिंग कमेटी के प्रमुख याशिरो मोरी को इस्तीफा इसलिए देना पड़ा कि उन्होंने महिला निदेशकों के बारे में टिप्पणी कर दी कि कई तो बहुत समय लगाती हैं। ज्ञात है कि कई आयोजक देशों की वित्तीय हालत नहीं सुधरी है। रिओ में 2016 में आयोजन के बाद ब्राजील माली हालत से नहीं उबर सका। पैसिफिक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और पोलिटिकल हिस्ट्री के लेखक जुल्स बोय्कोफ्फ ने जापान की बढ़ती पर्यावरण और आर्थिक समस्या पर चिंता प्रकट करते हुए इस आयोजन से देश को अधिक पीड़ा मिलने की आशंका जताई है। विदित है कि ग्रीस में 776 ईसा पूर्व प्राचीन ओलंपिक शुरू हुआ था। केवल विश्व युद्ध के दौरान यह रुका और अब कोविड ने रोक दिया। बर्लिन में 1916 में जबकि 1940 में शीत व ग्रीष्मकालीन गेम इटली में और ग्रीष्मकालीन खेल 1944 में ब्रिटेन में नहीं हो सका।

 

 

 

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