सम्मान पुरस्कार के नीचे दबा साहित्य क्या करेगा?
-विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन-
-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-
विषय शुरू करने के साथ यहाँ यह कहना बहुत लाज़िमी हैं कि यह समस्या प्राम्भ से हैं। इसका इतिहास साक्षी हैं। पर राजाओं के यहाँ कद्रदानों कि क़द्र होती थी। इसके लिए विद्वानों को राजा महाराजों के समक्ष खुशामद नहीं करना पड़ती थीबल्कि उनकी काबिलियत उनके काम गुण से ख्याति के कारण उनको सम्मान मिलता था जिसके वे हक़दार होते थे। उनकी ख्यातिउनकी कीर्ति लोकप्रियता आज भी उतनी हैं संभवतः उस समय न मिल पायी होंगीकारण साहित्यकार/विद्वान/दार्शनिक/चिंतक यहाँ तक कि भगवान भी उस समय उतने प्रतिस्थापित नहीं हो पाए जितना वर्तमान में हैं। तीर धनुष से छूटने के बाद कितनी दूर जा कर गिरता हैं ऐसे ही साहित्यकार का भविष्य होता हैं। पर साहित्य निर्थक नहीं होता। अक्षर का क्षरण नहीं होता। अक्षर अजर अमर होते हैं। जितने शुद्ध भाव से लिखे जाते हैं उनकी खुशबु स्वयं को नहीं मिलती पर खुशबु/गंध अपने आप वायु के माध्यम से फ़ैल जाती हैं। इसी प्रकार हमारा पुरातन साहित्य आज भी खुशबु फैला रहा हो चाहे रामायण हो महाभारत हो रहीम तुलसी कबीर मीरा रैदास हो और तो और राजा राम मोहन रायभारतेंदु हरिश्चन्द्र तिलक मदन मोहन मालवीय महावीर प्रसाद द्वेवेदी लाल लाजपत रायलालबलदेव सिंह गाँधी जी माधव राव सप्रे माखन लाल चतुर्वेदी गणेश शंकर विद्यार्थी बनारसी दास चतुर्वेदीआदि ऐसे कितने नामों का उल्लेख करे जिन्होंने कितने कष्टों के साथ हिंदी भाषासाहित्य का संरक्षण किया वरन नयी दिशाए दी।
जिन लोगों का उल्लेख किया उन्होंने भूखे पैसों के अभाव में रह कर स्वयं अपने हाथों से काम किया खुद कम्पोजिंग खुद प्रिंटिंग लिखना। बांटना आदि काम किये बिना किसी लोभ लालच के बस उनकी दीवानगी जूनून उनका मकसद था अपनी भाषा को कहानीकविताओं लेख के माध्यम से जन जन तक पहुचाना। आज हमें जो कुछ भी देखने मिल रहा हैं वह उनकी विरासत के कारण। जो संचित रहा सो हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। अभाव में जूझते रहेन परिवार कि चिंता न अपने भरण पोषण की।
गुलामी के समय तो जान हथेली पे लेकर निर्भीकता से काम किया उस समय वे सब सरकार के कोपभाजित थे तो उन्हें सम्मान या पुरूस्कार मिलना तो दूर उनका जीवन सकुशल बचा रहे यह विषम परिस्थिति थी। ऐसे हजारों लेखक कविचिंतक जो गुमनामी में रहकर मर गए खप गए कोई याद करने वाला नहीं। उस ज़माने में साहित्यकार कवि लेखक को पागल कि श्रेणी रखा जाता था। न परिवार का सहयोग आर्थिक विपन्नता के कारण ये लोग असामाजिक माने जाते थे।
मुद्रण के कारण और कुछ धनवानों ने समाचार पत्र निकाले जिससे आपसी संबाद शुरू हुए लेखों का आदान प्रदान हुआ मिलना जुलना शुरू हुआ तब वैचारिक मतभेद उभरे और एक विचार धारा के जुड़े और यही से अपने अपने गुट बने। पहले ईर्ष्यावश नफरत किसकी ?योग्यता की। पर योग्यता को दूसरे और तीसरे गुटों ने स्वीकारना शुरू किया तब एक दूसरे को सम्मान देने के लिए शब्द भाव दिल खुले जिससे दूसरों को कोफ़्त होना शुरू हुई। पर जिसको सम्मानित किया गया उसका भी प्रचार उसी मण्डली तक सीमित रही। इस परंपरा को उस समय अधिक प्रोत्साहन नहीं किया गया। कारण पेट कि लड़ाई प्रमुख थी। उस समय अधिकतर साहित्यकार पेट के संघर्ष अधिक चिंतित उसके बाद फिर अस्तित्व कि लड़ाई के लिए सम्मान का स्थान।
स्वतंत्रता के बाद जो पुराने साहित्यकार स्थापित हुए जैसे मैथली शरण गुप्ता राम धारी सिंह दिनकर हरिवंश राय बच्चन आदि को सरकारों ने ( केंद्र राज्य और स्थानीय )ने सम्मानित किया फिर नईनई पत्रिकाएं समाचार पत्र दैनिक साप्ताहिक पाक्षिक और मासिक निकलना शुरू हुए कवि सम्मेलनों का दौर चला और आवागमन दूर संचार का साधन बढ़ा और फिर अपनेअपने गुटों के माध्यम से एक दूसरे को ऊँचा उठाना या आलोचना के माध्यम से नीचे गिराना शुरू हुआ। इस लाम बंदी के कारण सरकारों से पुरूस्कार मिलना या सम्मान मिलना शुरू हुआ तो वे स्थापित लेखक साहित्यकार कवि मान्य होने लगे।
शिक्षा का चलन बढ़ा और नयी नयी प्रतिभाएं उभरी तब प्रतियोगिता शुरू हुई और फिर समाचार पत्रोंरेडियो टी.वीपत्रिकाओं में छ्पने का दौर और तेज़ी से बढ़ा और आर्थिक स्थिति ठीक होने से हर शहर में महानगरों में राजधानियों में अलग अलग संस्थाएं बनाए लगी लेखक संघकहीअहमवादी तो कही हिंदी साहित्यकारों कवियों समीक्षोको आलोचकों का और न जाने कौन कौन से संघसंस्था बन गयी। पहले अखिल भारतीय स्तर का सम्मान होता था फिर राज्य स्तरीय फिर शहरीय फिर मोहल्ले की और अब मैं तेरी तो मेरी।
इस समय लेखककवि साहित्यकार उपन्यासकार कहानीकार रचनाकार आदि इतने अधिक विद्वान हो गए कि अब अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता हैं सम्मान या पुरूस्कार लेने या देने में। यहाँ तक सब ठीक हैं।
इसके कारण लेखन साहित्य का सृजन का स्तर परखने का समय खत्म हो गया। आप कुछ भी लिखो वह साहित्य हैं स्तर का मूल्यांकन करने वाले भी वे ही हैं इससे सम्मान की संख्या बढ़ गयी और स्तर गिर गया सरकारी तंत्र पहुच या पैसा से खुलेआम प्राप्त किया जाता हैं और आप पर किसी का वरद हस्त हैं तो कोई कठिनाई नहीं। आज आप किसी गुट से जुड़ जाए या आप उस गुट में आर्थिक सहयोग की भागीदारी निभाए तो आपको परेशान होने कि जरुरत नहीं आपके पास सम्मान अपने आप आ जाएंगे। मज़ेदार बात यह हैं कि कल का लेखक जिसका साहित्य में शून्य योगदान हैं वह सम्मानित होता हैं और जो वर्षों से जुड़े हैं और उनका कोई माँ बाप नहीं हैं वह अस्तित्वहीन हैं। और आजकल आर्थिक सम्पन्नता होने से अखबार पत्रिका का प्रकाशन शुरू करदो संपादक बन जाओ तो आपको शासन से अनुदान विज्ञापन मिलेंगे और आपको शासन के गुण गान गाना हैं यह सबसे बड़ी योग्यता हैं।
आजकल नोबेल प्राइज भारत रत्न पद्म विभूषण पदमश्री आदि कि इतनी भरमार हो गयी हैं कि अब सम्मान का महत्व उतना नहीं रहा और हैं भी तो अपने दायरे में। कितने सम्मान पुरूस्कार मिल जाए पर आपकी योग्यता में निखार नहीं आया तो पुरूस्कार बेमानी लगते हैं। उन पुरुस्कार की सीमा तत्समय पेपर में छपना एक समाचार की तरह और उसका दीवाल पर टंग जाना।
इसीलिए सच्चे साधक मौन रह कर अपनी प्रतिभा को निखारने में खपे रहते हैं। और वे दीन दुनिया से दूर रह कर अज्ञात योध्या की तरह अपने कार्य में संलिप्त हैं।
मान सम्मान के कारण अपमान का डर लगा रहता हैं। जैसे जीतने में हार का डर हर समय रहता हैं धन में चोरी का भय सुंदरता में कुरूपता का डर पदोन्नति में पदावनति का डर लगा रहा हैं प्रसिद्धि में कलंक का डर। इसका सबसे अच्छा इलाज़ यह हैं की कर्म किये जा फल की इच्छा न रख रे इंसान। जब आप बिना किसी अपेक्षा के निःस्वार्थ भाव से काम करोंगे तो आपकी लेखनी में निखार आएंगे और आप कोई भी सत्ता रहे कोई भी नृप रहे आप बेफिक्र रहेंगे तथा आपके ऊपर किसी विशेष की छाप नहीं रहेंगी।
अंत में यह बात निश्चित हैं की अच्छे सच्चे कार्यो का मूल्यांकन होता हैं अभी नहीं तो जब आप नहीं रहेंगे तब होगा। इस कारण अपनी बैचैनी को न बढ़ाकर अपना श्रमलगन प्रतिभा निखारने में लगाए वही सच्ची उपलब्धि होगीयह सही हैं पुरूस्कार के लोभ के कारण हमारे साहित्य में गिरावट आयी हैं इससे हम अपना मुंह नहीं मोड़ सकते पर हम इसे रोक भी नहीं सकते कारण हम सब अपने अपने द्वीप में स्वतंत्र हैं। हम अन्य को न देखकर कुंठा के शिकार न बने। और सम्मान और पुरुस्कार सब अपने अपने भाग्य और पुरुषार्थ के साथ हिकमत का फल होता हैं। साम दाम दंड भेद के माध्यम से सफल होना कठिन नहीं हैं।
पहले लेखक कवि दाढ़ी बढ़ाये सर्वोदयी झोला और खादी का कुरता पायजामा में रहते थे अब अटैची के साथ शूटेड –बूटेड कवि लेखक उपन्यासकार पाए जाते हैं
काजल और कटाक्षों पर तो रीझ रही थी दुनिया सारी
मैंने किंतु बरसने वाली आँखों की आरती उतारी
रंग उड़ गए सब सतरंगी तार-तार हर साँस हो गई
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो ज़्यादा नहीं सिया जाएगा—(नीरज जी )
प्रकाश उइके बने भारतीय आदिमजाति सेवक संघ के नए अध्यक्ष
*आदिवासियों के लिए बनाएंगे लीगल सेल आदिवासियों में जागी एक नई उम्मीद दिल्ली | ( सहिल गौड़ …








