मध्य पूर्व में युद्ध के चलते गहराया प्राकृतिक गैस का संकट, भारत और दक्षिण कोरिया ने बिजली उत्पादन के लिए बढ़ाया कोयले का कोटा, ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया खतरा
बैंकॉक, 24 मार्च (ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस)। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एशियाई ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। युद्ध की स्थिति के कारण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, जहाँ से एशिया की लगभग 20% प्राकृतिक गैस (LNG) और तेल की आपूर्ति होती है। इस वैश्विक संकट के चलते गैस की सप्लाई ठप हो गई है, जिससे भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देशों के सामने बिजली संकट खड़ा हो गया है। मजबूरन, इन देशों ने पर्यावरण अनुकूल गैस के बजाय फिर से ‘कोयले’ पर अपनी निर्भरता बढ़ा दी है ताकि घरेलू और औद्योगिक बिजली की जरूरतों को बिना किसी रुकावट के पूरा किया जा सके।
भारत, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता है, ने भीषण गर्मी और बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए कोयला उत्पादन और इसके उपयोग के कोटे में भारी वृद्धि की है। दक्षिण कोरिया ने भी पूर्व में कोयला आधारित बिजली घरों पर लगाई गई पाबंदियों को हटा लिया है, जबकि वियतनाम और थाईलैंड अपने पुराने संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने की तैयारी कर रहे हैं। इस बीच, दुनिया के सबसे बड़े कोयला निर्यातक इंडोनेशिया ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री के बजाय अपने स्टॉक को घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित करना शुरू कर दिया है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण एशियाई बाजारों में कोयले की कीमतों में 13% तक का उछाल आया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कोयले की ओर यह वापसी ‘अस्थायी समाधान’ तो हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम बेहद चिंताजनक होंगे। कोयले के अत्यधिक दहन से कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा, जिससे एशिया के प्रदूषण कम करने के लक्ष्यों को करारा झटका लगेगा। ‘पावरिंग पास्ट कोल एलायंस’ की विशेषज्ञ जूलिया स्कोरुप्सका के अनुसार, जीवाश्म ईंधन पर यह निर्भरता भविष्य में और भी बड़े आर्थिक और स्वास्थ्य संकट की नींव रख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट एक चेतावनी है कि देशों को अब आयातित गैस या कोयले के बजाय सौर और पवन ऊर्जा जैसे ‘अक्षय ऊर्जा’ स्रोतों की ओर तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।
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