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लेख - November 18, 2021

प्रकृति ने हम सभी को हवा-पानी उपाहार स्वरूप प्रदान किये है

-विनोद तकिया वाला-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

आदिकाल से ही जब सर्वोच्च शक्ति ने श्रृष्टि के श्रंखला में जब पृथ्वी, सागर .. आकाश का निमार्ण किया तो इसी क्रम मे अपनी श्रृजन में प्रकृति में वन -प्राणी जीव-जन्तु कीट-पतंगे का निर्माण किया। हमारे धर्म ग्रंथों मे इसका उल्लेख किया गया है। प्रकृति मे हमेशा संतुलन बना रहे इसके लिए कुछ नियम भी बनाए गये है।जैसे-जन्म के साथ मृत्यु, श्रृजन-विध्वंस ‘ दिन-रात, सुःख-दुःख एक दुसरे का पूरक है,जो कटू सत्य है। इसके बदले में प्रकृति ने उपहार स्वरूप अपने अनमोल खजानो में से कुछ बेस कीमती अंश हवा-पानी निःशुल्क दिये है।प्रकृति ने अपनी संरचना में घुप-जंगल,पानी हवा पशु -पक्षी कई कीट -पतंग आदि के लिए भोजन ‘ मौसम आदि बना ये है।परमात्मा ने अपने श्रृष्टि में सर्वोतम कृति में मानव जिसे बुद्धि दी,जो हमेशा ही कुछ नये चीज का आविष्कार करता रहता है। कालान्तर में इसका नाम विज्ञान पड़ा है .।जो कल तक भगवान के रूप में जाना जाता था ।आज वही विज्ञान विनाश के रूप मे भयावह रूप धारण कर विध्वंश का ताण्डव कर रहा है। जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है ।इसका ताजा उधारण कोरोना जैसी वैश्विक महामारी है। जिन्होने विश्व को एक संदेश दे गया है ।मानव जितना भी विकाश कर ले लेकिन विकाश के नाम पर प्रकृति से छेड छाड वह ना करे । अगर प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया तो श्रृष्टि का विध्वंश हो जायेगा।कोरोना ने मानव को उनकी असलियत बताते हुए जीवन जीने का तरीका भी बताया है। मानव अपने भोग विलास की जीवन जीने में गलती पे गलती कर रहा है। परिणाम स्वरूप आज हमे ना साफ पानी मिलता है ना ही स्वच्छ हवा ।पानी तो हम बोतल बंद पी कर किसी तरह जी रहे है,लेकिन स्वच्छ हवा कहाँ से लायेगे।आज की कहानी देश की राजधानी दिल्ली पर आधार्रित है। दिवाली के बाद दिल्ली वासियो व एन सी आर के लोगो के लिए यहाँ के वातारण मे बढ़ते प्रदूषण चिन्ता का विषय बना हुआ है । दिल्ली-एनसीआर का एक्यूआई स्तर पिछले कुछ दिनों से लगातार 500 से ऊपर चल रहा है । देश की राजधानी क्षेत्र गैस-चेंबर बन गया है। ऐसे में इंसान तो क्या ऐसे दम-घोटू वातावरण में जीव जंतु और पेड़-पौधों तक का जीवित रह पाना मुश्किल हो गया है। यह स्थिति सिर्फ दिल्ली तक सीमित नही है।ब्लकि पूरे उत्तर भारत के सभी शहर के यहीं हालात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्राण वायू में प्रदूषित हवा और पीने में गन्दे (प्रदूषित) पानी के उपयोग से भारत में प्रतिवर्ष 40 लाख लोग आकाल मृत्यु के आगोश में समा जाते हैं। इनमें से अधिकांशतय 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चे और 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग होते हैं।जहरीली गैसे हमेशा बनती है और इन्सानों के फेफड़ों में पहुंच कर धीरे धीरे धीमा जहर का असर मौत का सफर बन जाते है।आज प्रदूषण का कहर दुसरे दिनों की तुलना में कम पैदा हो रहा है ।मगर हवा की गति कम होने के कारण प्रदूषण का दम-घोटू जहर गैस-चेंबर बन कर सीधा प्रभाव डाल रहा है ।
दिल्ली के अलग अलग स्थानों पर एक्यूआई स्तर मे बड़ा फर्क स्पष्ट रूप से यह सन्देश देता है की दिल्ली के दम-घोटू जहरीले गैस-चेंबर के लिए स्थानीय प्रदूषण जिम्मेवार है।अगर किसानों के पराली जलाने से दिल्ली का एक्यूआई स्तर 500 पहुंचता है तो जहाँ पराली जल रही है उस अंचल के हवा का एक्यूआई स्तर 1000 के आसपास होना चाहिए था। जहां पराली जल रही है ।उस जगह का एक्यूआई स्तर सामान्य है तो दिल्ली जो कि पराली जलने वाले स्थान से सैंकड़ों किलोमीटर दूर है, फिर पराली जलने से दिल्ली को कैसे इतना प्रदूषण का जहर दे सकता है।दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण के मामले का एक भाग है।सरकार ने प्रदूषण को पराली जलाने से जोड़ 40 लाख लोगों की मौत के कारण को मजाक बना कर घोर अमानवीय होने का परिचय दिया है और नागरिकों के जान माल की रक्षा करने की अपनी जिम्मेवारी से दूर भाग रही है। किसानों का पराली जलाना गलत है और हम इसकी वकालत नहीं कर रहे मगर दिल्ली के प्रदूषण स्तर बढ़ने के असली कारणों का सठीक आकलन कर वैज्ञानिक विधि से प्रदूषण को ख़त्म कर आम लोगों को दम-घोटू जहरीले गैस-चेंबर से मुक्ति दिलाने का काम कर रहे हैं।
प्रकृति और पंछी हमारे और सरकार के बनाए हुए नियमों का पालन नही करते और अपने नियम कानूनों के अनुसार चलते हैं। अभी हेमन्त ऋतु का समय चल रहा है जो शीत ऋतु से पहले आती है। इस ऋतु में दिन और रात के टेम्परेचर/तापमान में व्यवधान बहुत कम रहता है ।इस कारण हवा का प्रवाह धीमी गति से होता है। इस समय हवा में आद्रता भी पर्याप्त रहती है इस कारण प्रदूषण के सुक्ष्म कण आद्रता के साथ हवा में तैरने लगते और दम-घोटु गैस-चैंबर का माहौल बन जाता है। शीत ऋतु से पहले पेडपोधो के पत्ते भी पक कर झड़ने लगते हैं ।इस कारण जहरीली गैसों के सोखने की प्रक्रिया भी काफी धीमी गति से काम करती है। इस कारण परिस्थितियां और भी भयंकर रुप धारण कर लेती है। जहाँ बात दिल्ली में प्रदूषण की, तो जिस तरह से प्रचार किया जाता है कि दिल्ली गैस चैम्बर बन गई।दिल्ली प्रदूषण का हब हैप्यह सरासर गलत है। प्रदूषण केवल दिल्ली में ही नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ है और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की तो है, लेकिन उससेे अधिक इसकी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है ‘ क्योंकि तकनीकी और आर्थिक रुप से केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से सैंकड़ों गुण सक्षम है। क्या केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के नागरिक अलग अलग हैं । इसलिए सम्पूर्ण तंत्र को संघठित होकर इससे निपटना चाहिए। केवल दिल्ली सरकार के सिर पर प्रदूषण का दोष मढ़ना ठीक नहीं है।
दर असल प्रदूषण के स्तर को कम करने की केन्द्रसरकार-दिल्ली सरकार के संग् से सटे सीमाओं के राज्य सरकार की इच्छा शक्ति बिलकुल नही है और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने को प्राथमिकता दी जा रही है। तभी देश सवसे बडे सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार-राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि-प्रतिवन्ध के बावजूद पटाके क्यो जले ‘ पराली जलाने के कारगर उपाय केन्द्र सरकार को किसानो को उपलब्ध कराया जाय । फाईब स्टार ए सी रूम मे डिवेटस करने से ज्यादा प्रदूषण फैलता है। एक दुसरे पर आरोप लगाने के कोई ठोस कदम उठाने चाहिए ।जल्द से जल्द आपस मे बेठक कर कोई ठोस रण नीति बनाये-न्यायालय को बताये । सर्वोच्च न्यायालय की चिन्ता इस बात को स्पष्ट कर देती प्रदूषण का खतरा कितना भयावह है।
दिल्ली की सरकारें ने दिल्ली के स्कूल बंद ‘ र्निमाण कार्य,दिल्ली सरकार कार्यालय मे वर्क फ्राम होम आदि ठोस कदम उठाये है! आज सर्वोच्च न्यायालय मे केन्द्र सरकार-राज्य सरकार अपना अपना पक्ष रखने के दौरान दिल्ली सरकार ‘ केन्द्र सरकार व सीमा वर्ती राज्यो के सरकार कोई ठोस जवाब या कार्य योजना नही है।
अगर स्थिति काबु मे नही हुई तो कई हमे-हमारे परिवारो के सदस्यों को पानी की तरह आक्सीजन की सिलेन्डर को पीठ पर ‘गाड़ी में,घर मे,कार्यालय मे ले कर जीने का मजबूर ना होना पडे।अभी ज्यादा दिन भी नही हुए जब कोरोना संकट आक्सीजन को लेकर त्राहि त्राहि का कारुणिक दृश्य देखे थे ! हम सभी ने अपने को खोया था । ऐसी स्थिति पुनः ना आये इसके लिए सरकार के साथ आम जनता को भी सोचना पड़ेगा । भगवान सब को सद्बुद्धि प्रदान करे !
अभी आप से यह कहते हुए विदा लेते है-ना ही काहूँ से दोस्ती, ना ही काहूँ से बैर । खबरी लाल तो माॅगे, सबकी खैर ॥
फिर मिलेगे ‘ तीरक्षी नजर से तीखी खबर के संग तब तक के लिए अलविदा ।

 

 

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