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लेख - January 28, 2022

कैप्टन और सिद्धू की तकरार के मायने

-कुलदीप चंद अग्निहोत्री-

-: ऐजेंसी अशोक एक्सप्रेस :-

जैसे-जैसे पंजाब में मतदान की तारीख़ नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे विभिन्न राजनीतिक दलों में तल्ख़ी बढ़ती जा रही है। भाषा से नियंत्रण हटता जा रहा है और मामला गली-बाजार की लड़ाई के स्तर तक पहंुच रहा है। किसान समाज मोर्चा ने अभी अपने सभी प्रत्याशी खड़े नहीं किए हैं और वे सीटों को लेकर अभी आपस में कमरे के भीतर ही लड़-झगड़ रहे हैं। जब उनके सभी प्रत्याशी भी मैदान में आ जाएंगे तो यकीनन यह आतिशबाजी और तेज और मारक हो जाएगी। फिलहाल तो शाब्दिक युद्ध कैप्टन अमरेंद्र सिंह, सुखबीर सिंह बादल, भगवंत मान और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चल रहा है। कैप्टन को इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि वे उत्तेजना के बावजूद वाणी पर नियंत्रण रखने में सफल रहते हैं। लेकिन उनका वाणी पर नियंत्रण ही शायद कांग्रेस पर भारी पड़ रहा है। यदि वे भी सिद्धू की तरह गाली गलौज पर उतर आते तब शायद सोनिया कांग्रेस को इतनी चिंता न होती। वे गाली गलौज पर न उतर कर, बड़े ही संयम से कुछ पुराने तथ्यों को सार्वजनिक कर रहे हैं जो सोनिया पर केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में भारी पड़ रहे हैं। पिछले दिनों कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में ख़ुलासा किया कि नवजोत सिंह सिद्धू को मंत्रिमंडल में लेने के लिए उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के नजदीकी मध्यस्थ का मैसेज आया था। मैसेज में यहां तक कहा गया था कि फिलहाल आप सिद्धू को मंत्री बना दें, यदि बाद में वह आपके हिसाब से ठीक न रहे तो आप उसे हटा सकते हैं।

कैप्टन का कहना है कि उन्होंने वे मैसेज सोनिया गांधी को अग्रेषित कर दिए थे। सोनिया गांधी ने रहस्यमय चुप्पी धारण किए रखी, लेकिन उनकी बेटी ने जरूर उत्तर दिया कि सिद्धू पागल है, उसे ऐसे मैसेज नहीं करवाने चाहिए। इसके बाद मामला ठप्प हो गया। लेकिन शायद इन मैसजों के आदान-प्रदान के बाद ही नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान गया था, जहां उसने एक सार्वजनिक सभा में इमरान खान की जम कर तारीफ ही नहीं की थी बल्कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा का आलिंगन भी किया था। कुछ पत्रकारों ने सिद्धू की इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी लेनी चाही तो उसका उत्तर था कि मरे को क्या मारना, यानी मैं कैप्टन की किसी बात का उत्तर नहीं दूंगा क्योंकि अब उसकी कोई औक़ात नहीं है। सिद्धू की नजर में कैप्टन की अब कोई औक़ात नहीं हो सकती, लेकिन यह घटना उस समय की है जब कैप्टन की औक़ात थी और सिद्धू की कोई औक़ात नहीं थी। जाहिर है सिद्धू या तो उत्तर देने से बचना चाहते थे या फिर उनके पास उत्तर था ही नहीं। लेकिन अब यह मामला सिद्धू से ज्यादा सोनिया गांधी के आसपास घूमना शुरू हो गया है क्योंकि कैप्टन ने यह भी बताया कि सोनिया गांधी जब सिद्धू को कांग्रेस में लेना चाहती थी तो उन्होंने कैप्टन अमरेंद्र सिंह को ही उसका मूल्यांकन कर रिपोर्ट देने के लिए कहा था।

कैप्टन की रिपोर्ट सिद्धू के पक्ष में नहीं थी। लेकिन उसके बावजूद सोनिया गांधी ने सिद्धू को पार्टी में शामिल कर लिया। तिथि क्रम से देखें तो सिद्धू के पक्ष में पाकिस्तान के दबाव की घटना इसके बाद हुई। उसके बाद सिद्धू ने पाकिस्तान में जाकर इमरान खान के पक्ष में भाषण दिया। इस भाषण के बाद कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने सार्वजनिक रूप से सिद्धू के इस कृत्य से अपनी असहमति जताई। लेकिन उसके बाद से ही सोनिया गांधी का दबाब कैप्टन अमरेंद्र सिंह पर बढ़ने लगा कि नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनाया जाए। जाहिर है कि पाकिस्तान को लेकर उक्त घटनाक्रम के रहते कैप्टन इस बात से कैसे सहमत हो सकते थे। उन्होंने परोक्ष रूप से एक-दो बार सार्वजनिक बयान भी दिए कि पंजाब सीमांत प्रदेश है और पाकिस्तान पंजाब में कुछ न कुछ शरारत करता रहता है, वह हिंदू-सिख में विवाद करवाने के प्रयास भी करता रहता है। इसलिए पंजाब में कोई ऐसा राजनीतिक प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे यहां अस्थिरता फैले और पाकिस्तान अपनी चाल में सफल हो सके। लेकिन सोनिया गांधी का दबाव बराबर बना रहा और कैप्टन को सिद्धू को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करना पड़ा। मामला यहां तक होता तब भी गनीमत थी। कैप्टन पाकिस्तान के विरोध में बयानबाजी बंद नहीं कर रहे थे। जाहिर है नवजोत सिंह सिद्धू और उसके यार इमरान खान के बीच कैप्टन अमरेंद्र सिंह ही रोड़ा था। इसलिए उसको हटाना जरूरी था। सोनिया गांधी ने अंततः वह भी कर दिया। लेकिन रणनीति तो इससे भी आगे की थी। कैप्टन कह चुके थे कि पाकिस्तान पंजाब में हिंदू-सिख के बीच दरारें डालने का काम कर रहा है। लेकिन उस काम को कैप्टन को हटाने के बाद सोनिया कांग्रेस ने या तो जानबूझकर या फिर अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए सम्पन्न किया। मुख्यमंत्री के लिए सुनील जाखड़ का भी नाम कांग्रेस के भीतर से प्रमुखता से आने लगा था।

मुख्यमंत्री कांग्रेस को ही चुनना था। यदि सोनिया गांधी को लगता था कि सुनील जाखड़ उनको राजनीतिक नफा-नुक़सान के आधार पर अनुकूल नहीं लगते तो उनको नकारने का अधिकार उनके पास था ही नहीं। लेकिन उसको नकारने के लिए सोनिया गांधी कांग्रेस ने जो रास्ता अपनाया, वह पंजाब के लिए बहुत ख़तरनाक था। इस काम के लिए अम्बिका सोनी को मैदान में उतारा गया। उस महिला ने सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस की ओर से घोषणा की कि पंजाब में कोई हिंदू मुख्यमंत्री नहीं बन सकता, यहां केवल सिख ही मुख्यमंत्री बन सकता है। सुनील जाखड़ को इस बयान के बिना भी मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर किया जा सकता था। लेकिन शायद कांग्रेस का मक़सद जाखड़ को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर करना इतना नहीं था जितना हिंदू-सिखों के मनों में दरार पैदा करना। पंजाब के लोगों को सोनिया कांग्रेस का यह ख़तरनाक खेल इतना घटिया लगा कि अमृतसर स्थित अकाल तख्त के जत्थेदार को भी कहना पड़ा कि मुख्यमंत्री के लिए योग्यता देखी जानी चाहिए, मजहब कोई भी हो, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है। कैप्टन के अनुसार यह काम पाकिस्तान कर रहा था लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से तो लगता है कि यह काम सोनिया कांग्रेस भी उसी गंभीरता से कर रही है। कांग्रेस के पास इसका समुचित अनुभव भी है और उद्देश्य भी। दिल्ली में 1984 में हुआ नरसंहार इसका प्रमाण है। अब पुनः बात पाकिस्तान से आए मैसेजों की। सोनिया गांधी भी इस पर चुप्पी लगाकर बैठ गई हैं। आधुनिक तकनालोजी के लोग कहते हैं कि सारे मैसेज पुनः निकाले जा सकते हैं। लगता है धीरे-धीरे शिकंजा कसता जा रहा है।

 

 

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