Home देश-दुनिया सुप्रीम कोर्ट ‘राजद्रोह’ कानून की वैधता पर 10 मई को करेगा सुनवाई (अपडेट)

सुप्रीम कोर्ट ‘राजद्रोह’ कानून की वैधता पर 10 मई को करेगा सुनवाई (अपडेट)

नई दिल्ली, 05 मई (ऐजेंसी/अशोक एक्सप्रेस)। भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए (राजद्रोह) की वैधता को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने के निर्देश देने की मांग संबंधी याचिकाओं पर 10 मई को सुनवाई होगी। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को इस सवाल पर विचार करने पर सहमत हुई कि राजद्रोह कानून पर विवाद के इस मामले को पांच या सात न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष भेजा जाए या नहीं। अदालत ने अगली सुनवाई से पहले शनिवार- सोमवार के दौरान संबंधित पक्षों को अपनी लिखित दलीलें और जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध और अन्य संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पर मामले को अगले मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश रमना और न्यायमूर्ति सूर्य कांत एवं न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने पांच या सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने के सवाल पर विचार करने की सहमति व्यक्त करने से पहले संबंधित पक्षों की दलीलें सुनीं तथा केदार नाथ सिंह मामले (1962) (जिसमें आईपीसी की धारा 124 ए की वैधता को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ बरकरार रखा था) पर गौर किया।
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील देते हुए वर्तमान राजद्रोह कानून को स्वतंत्र भारत के विचारों के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 124-ए से संबंधित यह कानून असंवैधानिक है। हालांकि, कपिल सिब्बल ने कहा कि इसे सात न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है।
श्री सिब्बल ने दलील पेश करते हुए कहा कि सरकार की आलोचना को असंतोष पैदा करने के रूप में नहीं माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि केदार नाथ सिंह के फैसले के बाद से दशकों में काफी बदलाव हुए हैं।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार के शीर्ष कानून अधिकारी अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा,“मेरी राय में राजद्रोह कानून बरकरार रहना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कहा कि शीर्ष अदालत को इस कानून के संबंध में एक दिशानिर्देश पारित करना चाहिए।”
श्री वेणुगोपाल ने इस मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का विरोध किया। अपनी दलीलों में उन्होंने कहा कि केदार नाथ सिंह मामले के फैसले के मद्देनजर राजद्रोह कानून वैध है। अदालत इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित कर सकती है।
केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के मद्देनजर कहा कि याचिकाकर्ताओं की गलियों का सरकार की प्रतिक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि सरकार का विचार बहुत अधिक समग्र दृष्टिकोण वाला होगा।
उन्होंने मामले को स्थगित करने की मांग करते हुए पीठ के समक्ष कहा कि राजद्रोह कानून पर जवाब वकीलों द्वारा तैयार किया गया है और सक्षम अथॉरिटी द्वारा इसे अनुमोदित करने की जरूरत है।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई की तारीख मुकर्रर करते हुए अगली सुनवाई से पहले शनिवार- सोमवार के बीच संबंधित पक्षों को अपनी दलीलें एवं जवाब हलफनामे के जरिए दाखिल करने का निर्देश दिया।
पीठ ने श्री मेहता को करीब एक साल से लंबित याचिकाओं पर सोमवार तक लिखित जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका भी दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने अगली सुनवाई की तारीख मुकर्रर करते हुए एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि इस मामले को स्थगित नहीं किया जाएगा।
इससे पहले सरकार ने पीठ के समक्ष आवेदन कर दो दिनों और फिर रविवार को एक दिन का अतिरिक्त समय देने की गुहार लगाई थी।
मुख्य न्यायाधीश रमना और न्यायमूर्ति सूर्य कांत एवं न्यायमूर्ति हिमा कोहली की विशेष पीठ ने 27 अप्रैल को सुनवाई करते हुए सरकार को 30 अप्रैल तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। पीठ ने साथ ही इस मामले के निपटारे के लिए सुनवाई की तारीख 5 मई मुकर्रर करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा था कि एक साल से लंबित इस मामले में स्थगन आदेश की कोई अर्जी स्वीकार नहीं की जाएगी।
इस बीच सरकार ने रविवार को एक नया आवेदन पत्र दायर कर कहा था कि जवाब तैयार है, लेकिन संबंधित अथॉरिटी से स्वीकृति मिलनी अभी बाकी है। लिहाजा, इस मामले में कुछ अतिरिक्त समय चाहिए।
इससे पहले 27 अप्रैल को सरकार ने कहा था कि जवाब तैयार है उसे अंतिम रूप दिया जाना बाकी है।
शीर्ष अदालत ने इस मामले में आखिरी सुनवाई जुलाई 2021 को होने का जिक्र करते हुए शीघ्र निपटाने के उद्देश्य से सरकार से 30 अप्रैल तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा था।
राजद्रोह के तहत अधिकतम सजा के रूप में आजीवन कारावास वाले इस कानून पर मुख्य न्यायाधीश रमना ने पिछली सुनवाई पर सॉलिसिटर जनरल श्री मेहता की दलीलें सुनने के बाद उन्हें केंद्र की ओर से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के समक्ष श्री मेहता ने 27 अप्रैल को अपनी ओर से कहा था कि याचिकाओं पर जवाब लगभग तैयार है। उसे (जवाब को) अंतिम रूप देने के लिए दो दिनों का समय चाहिए। इस पर पीठ ने कहा था कि सप्ताह के अंत तक जवाब दाखिल कर दें।
मैसूर स्थित मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस जी वोम्बटकेरे, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया एवं अन्य की ओर से राजद्रोह कानून के खिलाफ याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
शीर्ष अदालत ने याचिकाओं की सुनवाई करते हुए (15 जुलाई 2021 को) राजद्रोह कानून के प्रावधान के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त व्यक्त करने के साथ ही सवाल करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता के लगभग 75 वर्षों के बाद भी इस कानून की क्या आवश्यकता है?
शीर्ष अदालत ने विशेष तौर पर ‘केदार नाथ सिंह’ मामले (1962) में स्पष्ट किया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के तहत केवल वे कार्य राजद्रोह की श्रेणी में आते है, जिनमें हिंसा या हिंसा को उकसाने के तत्व शामिल हों।
शीर्ष अदालत के समक्ष दायर याचिकाओं में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए संविधान के अनुच्छेद 19(1) (ए) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

 

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