Home देश-दुनिया पुरी में रथयात्रा की धूम, लाखों की संख्या में उमड़े श्रद्धालु

पुरी में रथयात्रा की धूम, लाखों की संख्या में उमड़े श्रद्धालु

-दो साल बाद बडदांड में भक्त और भगवान का मिलन

पुरी, 01 जुलाई (ऐजेंसी/अशोक एक्सप्रेस)। चार धामों में से एक विश्वप्रसिद्ध पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में वार्षिक रथयात्रा के मौके पर शुक्रवार को देश-विदेश से लाखों की श्रद्धालु यहा पहुंचे भगवान जगन्नाथ, भगवान बलवद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा में शामिल हुए।
बारहवीं शताब्दी के इस ऐतिहासिक मंदिर के सामने ‘बड़ा डंडा’ (ग्रैंड रोड) के रूप में जाने जाने वाले तीन किलोमीटर लंबे सड़क पर तिल धरने को भी जगह नजर आयी। मंदिर के सेवकों ने जैसे ही भगवान जगन्नाथ्र, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों को बाहर निकाला, समूचा माहौल ‘जय जगन्नाथ’, ‘हरिबोल’ के उदघोष से गूंज उठा।
इससे पहले सुबह भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलवद्र और बहन देवी सुभद्रा के लिए सेवकों द्वारा अनुष्ठानों की रस्म पूरी की गयी, जिसमें देवताओं को बाहर निकालने से पहले आवश्यक अनुष्ठानों के बाद ‘गोपाल भोग’ (नाश्ता) देना शामिल था। कड़ी सुरक्षा के बीच आनंद बाजार और ‘बैशी पहाचा’ (मंदिर की बाईस सीढ़ियां) से होते हुए शंख फूंकने के बीच सैकड़ों मंदिर सेवकों ने मंदिर से देवताओं को अपने कंधों पर उठा लिया। भगवान जगन्नाथ के 16 पहियों वाले लाल और पीले रंग के ‘नंदीघोष’, 14 पहियों वाले बलभद्र के लाल और हरे रंग के ‘तालध्वज’ और देवी सुभद्रा के लाल और काले रंग के ‘देवदलन’ के रथों में 12 पहिए हैं।
अनुष्ठानों के तहत भगवान बलवद्र को पहले ‘रत्न वेदी’ से बाहर निकाला गया और औपचारिक ‘पहंडी बिजे’ के माध्यम से तलध्वज नामक रथ में स्थापित किया गया, उसके बाद देवी सुभद्रा को ‘दार्पदलन रथ’ और अंत में भगवान जगन्नाथ को प्यार से बुलाया गया। लाखों भक्तों द्वारा ‘कालिया’ को ‘नंदीघोष’ रथ में स्थापित किया गया।
कोविड महामारी के कारण पिछले दो वर्षों से रथयात्रा महोत्सव देखने से वंचित रहे लाखों श्रद्धालु जैसे ही मंदिर से देवी-देवताओं को बाहर आते देख ‘हरिबोल’ और ‘जय जगन्नाथ’ के नारे लगाने लगे।
माना जाता है कि सार्वजनिक रूप से देवताओं की उपस्थिति अंधेरे को दूर करने और प्रकाश लाने के लिए माना जाता है। भगवान जगन्नाथ, भगवान बलवद्र और देवी सुभद्रा की एक झलक पाने के लिए लायंस गेट पर भक्तों की व्यापक भीड़ थी।
मंदिर प्रबंधन के सूत्रों ने कहा कि मंदिर प्रशासन द्वारा निर्धारित समय से तीन घंटे पहले देवताओं की पूजा की गई।
सुदर्शन के साथ तीन पीठासीन देवताओं को रथों में स्थापित करने के बाद, पुरी शंकराचार्य स्वामी निशालानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ रथों के ऊपर देवताओं के पास गए और प्रार्थना की।
लायंस गेट से गुंडिचा मंदिर तक ग्रैंड रोड के दोनों ओर स्थित सभी भवनों की छतें आज सुबह से ही भक्तों से खचाखच भरी हुई थीं। रथ पर देवताओं के ‘दर्शन’ के लिए रथ यात्रा स्थल में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे भव्य सड़क की ओर जाने वाली सभी गलियों और छोटी गलियों में भी भक्तों की भीड़ लगी रही।

महत्वपूर्ण तथ्य

पुरी के इस मंदिर को सतयुग में राजा इंद्रद्युम ने बनवाया था। महाभारत के वनपर्व में इस मंदिर का सबसे पहले प्रमाण मिलता है। वर्तमान मंदिर 7वीं सदी में बनवाया गया। 1174 ईस्वी में ओडिशा के शासक अनंग भीमदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराय। मुख्य मंदिर के करीब 30 छोटे-बड़े मंदिर हैं। भगवान जगन्नाथ रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण नीम की पवित्र लकड़ी से होता है। रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील,कांटे और धातु का उपयोग नहीं होता। मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरित दिशा में लहराता है। प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। यह मंदिर चार लाख वर्गफुट क्षेत्र में फैला है। इसकी ऊंचाई करीब 214 फीट है। मंदिर के गुबंद की छाया नहीं बनती है। पास खड़े होकर मंदिर के गुबंद को नहीं देखा जा सकता। पुरी में किसी भी जगह से मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखा जा सकता है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है।

रथयात्रा मंदिर से निकलकर गुंडीजा मंदिर पहुंचती है। गुंडीचा मार्जन परंपरा के अनुसार रथयात्रा से एक दिन पहले श्रद्धालु गुंडीचा मंदिर को शुद्ध जल से धोकर साफ करते हैं। इसी परंपरा को गुंडीचा मार्जन परंपरा कहते हैं। जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर समुद्र की किसी भी ध्वनि को नहीं सुना जा सकता। मंदिर से बाहर कदम रखते ही यह ध्वनि सुनाई देने लगती है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह पांच कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा की अधूरी मूर्तियां विराजमान हैं। इन मर्तियों के अधूरे बनने और लकड़ी के बनाने के पीछे राजा इंद्रद्युम और उनकी पत्नी गुंडीचा से जुड़ी लंबी कहानी है। भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई 11वीं शताब्दी में राजा इंद्रवर्मा के समय शुरू हुई थी। इसे विश्व की सबसे पुरानी रसोई माना जाता है। इस इस रसोई में प्रतिदिन करीब एक लाख लोगों के लिए भोजन पकता है। भगवान को हर रोज छह वक्त भोग लगता है। करीब 500 रसोइये 300 सहयोगियों के साथ यहां भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद बनाते हैं। यहां एक बार भोग बनने के बाद सभी हांडियों को तोड़ दिया जाता है।अगली बार नए बर्तनों में भगवान का भोग बनता है। भगवान का भोग 700 छोटी-बड़ी मिट्टी की हांडियों में बनाया जाता है। भगवान जगन्नाथ का भोग 240 चूल्हों में बनता है।

 

 

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