जल संकट : समझनी होगी बेशकीमती पानी की महत्ता
-योगेश कुमार गोयल-
-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-
पिछले सप्ताह देश में जल सप्ताह का आयोजन किया गया, जिसमें जल संरक्षण, जल के उपयोग एवं जल स्रोतों को संरक्षित करने के विषय पर चर्चा के लिए विभिन्न देशों के दो हजार से भी ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए। जल सप्ताह के दौरान जल शोधन तथा जल को बचाने के लिए गंभीरता से चर्चा हुई। ग्रेटर नोएडा में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग, जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित भारत जल सप्ताह का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कहना था कि आने वाली पीढ़ियों को बेहतर और सुरक्षित कल देने में सक्षम होने का एकमात्र तरीका जल संरक्षण ही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पानी की कमी को लेकर व्याप्त संकट अकेले भारत की ही समस्या है बल्कि जल संकट अब दुनिया के लगभग सभी देशों की विकट समस्या बन चुका है। राष्ट्रपति का भी कहना था कि पानी का मुद्दा केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। इस अवसर पर केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत का कहना था कि देश में जनसंख्या और जल की उपलब्धता में विषमता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। देश में आज कई इलाके ऐसे हैं, जो जल संकट की भयावह स्थिति से गुजर रहे हैं। इसके अलावा कुछ राज्यों के बीच बरसों से पनप रहे जल विवाद भी समस्या को विकराल बनाते रहे हैं। इसीलिए उपराष्ट्रपति ने भारत जल सप्ताह के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि राज्यों के बीच जल विवाद से कोई लाभ नहीं होगा और उन्हें जल विवादों से बचना चाहिए तथा इनका हल निकालना चाहिए। देश में जल संकट को लेकर अब जिस प्रकार की स्थितियां निर्मित होने लगी हैं, ऐसे में देश में हर साल जल सप्ताह मनाने की नहीं बल्कि पूरे साल ‘जल वर्ष’ मनाने की सख्त दरकार है।
वर्ष 2018 में शिमला जैसे पर्वतीय क्षेत्र में भी पानी की कमी को लेकर हाहाकार मचा था और उसके अगले वर्ष चेन्नई में भी वैसी ही स्थिति देखी गई थी। महाराष्ट्र हो या राजस्थान, बिहार हो या झारखण्ड या देश की राजधानी दिल्ली, प्रतिवर्ष अब विशेषकर गर्मी के मौसम में तो जगह-जगह से पानी को लेकर लोगों के बीच आपस में मारपीट या झगड़े-फसाद की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे मामले जल संकट गहराने की समस्या को लेकर हमारी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त थे किन्तु फिर भी इससे निपटने के लिए सामुदायिक तौर पर कोई गंभीर प्रयास होते नहीं दिख रहे। यही कारण है कि भारत में बहुत सारे शहर अब शिमला तथा चेन्नई जैसे हालातों से जूझने के कगार पर खड़े हैं। चिंताजनक स्थिति यह है कि दुनियाभर में पानी की कमी के कारण विभिन्न देशों में और भारत में तो विभिन्न राज्यों में ही जल संधियों पर संकट के बादल मंडराते रहे हैं। विभिन्न राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के मामले में कई दशकों से गहरे मतभेद बरकरार हैं, जिस कारण राज्यों के आपसी संबंधों में तनातनी देखी जाती रही है। वर्तमान में भी जल वितरण का मामला अधर में लटका रहने से कुछ राज्यों में जलसंकट की स्थिति गंभीर बनी है।
अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह उल्लेख किया है कि पृथ्वी का करीब तीन चौथाई हिस्सा पानी से लबालब तो है लेकिन धरती पर मौजूद पानी के विशाल स्रोत में से महज एक-डेढ़ फीसदी पानी ही ऐसा है, जिसका उपयोग पेयजल या दैनिक क्रियाकलापों के लिए किया जाना संभव है। ‘इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी’ का कहना है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा में से मात्र तीन प्रतिशत पानी ही स्वच्छ बचा है और उसमें से भी करीब दो प्रतिशत पानी पहाड़ों व ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है जबकि शेष एक प्रतिशत पानी का उपयोग ही पेयजल, सिंचाई, कृषि तथा उद्योगों के लिए किया जाता है। बाकी पानी खारा होने अथवा अन्य कारणों की वजह से उपयोगी अथवा जीवनदायी नहीं है। पृथ्वी पर उपलब्ध पानी में से इस एक प्रतिशत पानी में से भी करीब 95 फीसदी पानी भूमिगत जल के रूप में पृथ्वी की निचली परतों में उपलब्ध है और बाकी पानी पृथ्वी पर सतही जल के रूप में तालाबों, झीलों, नदियों अथवा नहरों में तथा मिट्टी में नमी के रूप में उपलब्ध है। स्पष्ट है कि पानी की हमारी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति भूमिगत जल से ही होती है लेकिन इस भूमिगत जल की मात्रा भी इतनी नहीं है कि इससे लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें। वैसे भी जनसंख्या की रफ्तार तो लगातार बढ़ रही है किन्तु भूमिगत जलस्तर बढ़ने के बजाय घट रहा है, ऐसे में पानी की कमी का संकट तो गहराना ही है।
प्रदूषण मुक्त सांसें पुस्तक में मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि देश में जल संकट गहराते जाने का प्रमुख कारण भूमिगत जल का निरन्तर घटता स्तर ही है। हालांकि सर्वविदित तथ्य यही है कि जल ही जीवन है और पानी के बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन जब हर जगह पानी का दुरूपयोग होते दिखता है तो बहुत अफसोस होता है। पानी का अंधाधुध दोहन करने के साथ-साथ हमने नदी, तालाबों, झरनों इत्यादि अपने पारम्परिक जलस्रोतों को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसी कारण वर्षा का पानी इन जलसोतों में समाने के बजाय बर्बाद हो जाता है। भारत ऐसा देश है, जिसकी गोद में कभी हजारों नदियां खेलती थी लेकिन आज इन हजारों नदियों में से सैकड़ों ही शेष बची हैं और वे भी अच्छी हालत में नहीं हैं। हर गांव-मौहल्ले में कुएं और तालाब हुआ करते थे, जो पूरी तरह गायब हो गए हैं। ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यही है कि पृथ्वी की सतह पर उपयोग में आने लायक पानी की मात्रा वैसे ही बहुत कम है और अगर भूमिगत जल स्तर भी निरन्तर गिर रहा है तो हमारी पानी की आवश्यकताएं कैसे पूरी होंगी? इसके लिए हमें वर्षा के पानी पर आश्रित रहना पड़ता है किन्तु वर्षा के पानी का भी सही तरीके से संग्रहण न हो पाने के कारण ही इस पानी का भी समुचित उपयोग नहीं हो पाता।
बहरहाल, केवल यह समझने से ही काम नहीं चलेगा कि वर्षा की एक-एक बूंद अनमोल है बल्कि इसे सहेजने के लिए भी देश के प्रत्येक व्यक्ति को संजीदा होना होगा। यदि हम वर्षा के पानी का संरक्षण किए जाने की ओर खास ध्यान दें तो व्यर्थ बहकर नदियों में जाने वाले पानी का संरक्षण करके उससे पानी की कमी की पूर्ति आसानी से की जा सकती है और इस प्रकार जल संकट से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जल संकट आने वाले समय में बेहद विकराल समस्या बनकर न उभरे, इसके लिए हमें समय रहते पानी की महत्ता को समझना ही होगा और हमें लोगों को जल संरक्षण के प्रति ज्यादा से ज्यादा जागरूक करने के लिए वर्षभर जल सप्ताह जैसे ही आयोजन करते रहने होंगे।
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