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आरक्षण पर उ.प्र. सरकार सुप्रीम कोर्ट में

-सनत जैन-

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

राज्य सरकारें और केंद्र सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए कुछ इस तरीके के निर्णय लेते है। जो विवादों में आ जाएं सरकार जो चाहती है वह अदालत के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से हासिल कर लिया जाए। पिछले कुछ वर्षों से चुनाव टालने के लिए राज्य सरकारें आरक्षण और परिसीमन के निर्णय ठीक चुनाव के पहले लेती है। यही सहकारिता के क्षेत्र में चुनाव आने पर भी किया जाता है। इसके बाद लोग न्यायालय की शरण में जाते है। फिर हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट का सिलसिला शुरू होता है। इसमें चुनाव टल जाते है। सरकार जो चाहती थी वह हो जाता है। सरकार भी अपनी ‎जिम्मेदारी से बची रहती है।
केंद्र सरकार को दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालने थे। चुनाव नजदीक आते ही 3 नगर निगमों को 1 नगर निगम बनाकर परिसीमन के नाम पर कई महीनों तक दिल्ली नगर निगम के चुनाव टाल दिए गए। जबकि चुनाव समय पर कराने के लिए केंद्र सरकार जो निर्णय लेना चाहती थी। चुनाव के 6 महीने अथवा 1 साल पहले ले सकती थी। इसी तरह लगभग सभी राज्य सरकारों द्वारा स्थानीय चुनाव सहकारिता के चुनाव और अन्य ऐसे मामले जो सरकार के लिए मुफीद नहीं होते है। उनके बारे में इसी तरह के निर्णय येन समय पर किए जाते है। पीड़ित या प्रभावित पक्ष इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर करता है। वहां से जो भी निर्णय होता है। दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट चला जाता है। सरकार जब तक चाहती है। तब तक मामला न्यायालयों में लटका रहता है। जो नियम कायदे कानून का कंपल्शन था वह न्यायालय के स्टे की आड़ में टलता रहता है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश की सरकार ने नगरीय निकायों के चुनाव कराने के लिए आरक्षण मैं परिवर्तन किया इसको लेकर लोग उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट में चले गए। हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया उससे उत्तर प्रदेश सरकार सहमत नहीं हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी है। इस अपील की सुनवाई होने और निर्णय आने तक यह मामला टलता रहेगा। कानूनी लड़ाई में सरकार यदि तत्परता नहीं दिखाएगी तो यह मामला कई माह तक टलता रहेगा। चुनाव ‎निर्धा‎रित समय पर नहीं होंगे। स्थानीय सत्ता अ‎धिका‎रियों के पास चली जाएगी।
विभिन्न राजनीतिक दलों और विभिन्न सरकारों द्वारा न्यायालय में अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए इस तरह के विवादित फैसले समय-समय पर किए जाते है। जिसके कारण कानूनी बाध्यता होते हुए भी समय पर चुनाव नहीं हो पाते हैं। नियुक्तियां और प्रमोशन नहीं हो पाने जैसे लाखों मामले न्यायालयों में लंबित हैं। देश में 5 करोड़ के लगभग मामले न्यायालयों में लंबित है। इन सारे मामलों में लगभग 80 फ़ीसदी मामले सरकार के इसी तरह के निर्णय से संबंधित होते है। शासन स्तर पर या प्रशासनिक स्तर पर जो निर्णय किए जाते है। पीड़ित पक्ष न्याय के ‎लिये न्यायालय में चला जाता है। कई वर्षों और दशकों तक यह मामले न्यायालयों में लंबित बने रहते हैं। आरक्षण को लेकर मध्यप्रदेश में पिछले कई वर्षों से प्रमोशन नहीं हुए अधिकारी और कर्मचारी रिटायर्ड हो गए। पूरा कैडर बिखर गया। नई नियुक्तियां नहीं हो पाई। यह सब राजनीतिक दृष्टि से लिए गए निर्णय और उन्हें लंबित बनाए रखने के पीछे राजनीतिक लाभ और हानि से जोड़कर देखा जाता है। जब सरकार ही न्यायालयों का राजनीति ‎हितों में उपयोग करने लगे तो न्यायपालिका कैसे लंबित मामलों की सुनवाई समय पर कर पाएगी। 5 करोड़ लंबित मामलों को लेकर सरकार भी न्यायपालिका को ही जिम्मेदार ठहरा रही है। न्यायपालिका के ऊपर दिनोंदिन जिस तरीके से सरकारी दबाव और सरकारी आदेशों के ‎खिलाफ मामले बढ़ रहे हैं। सुनवाई और फैसलों में सरकार का दबाव दिख भी रहा है। न्यायपालिका के लिए सरकार या आम आदमी दोनों ही पक्ष बराबर हैं। न्यायालयों के सामने सरकार सक्षम वर्ग में आती है। आम आदमी सरकार के सामने एक निर्बल भूमिका में होता है। न्यायालयों का संरक्षण निर्बल वर्ग के लिए भी होना चाहिए जो अब होता हुआ नहीं दिखता है। यह चिंता की बात है।

 

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