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लेख - April 20, 2023

क्या कहती है खाते हुए नेताओं की तस्वीरें

-सर्वमित्रा सुरजन-

-: ऐजेंसी/अशोका एक्स्प्रेस :-

मंगलवार को दो तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब चलीं। न खाऊंगा, न खाने दूंगा की ऐलानिया राजनीति में दोनों ही तस्वीरें दो नेताओं के खाने की ही हैं। एक भाजपा के नेता हैं, एक कांग्रेस के नेता हैं। दोनों तस्वीरें मौजूदा सियासत की हकीकत बयां कर रही हैं। पहली तस्वीर भाजपा नेता संबित पात्रा की है। जो ओडिशा के पुरी में बंधामुण्डा ग्राम पंचायत में किसी आदिवासी के घर पखाल ग्रहण कर रहे हैं। पखाल पानी में भात डालकर बनाए व्यंजन को कहते हैं। गर्मी में लू आदि से बचने के लिए इसके सेवन की सलाह दी जाती है। लेकिन इस वक्त जैसी सियासी गर्मी देश में चढ़ी हुई है, उसमें संबित पात्रा को पखाल के सेवन से कोई राहत मिलेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। आम ग्रामीणों की तरह उनके बीच, उनके साथ श्री पात्रा पखाल खाते तो बात अलग थी। मगर ये तस्वीर तो कुछ और ही बोल रही है।

तस्वीर तुम चुप रहो वाले आदेश को नहीं मानती। जो दिखता है, साफ-साफ बता देती है। संबित पात्रा ने आदिवासी परिवार के घर पखाल खाने की तस्वीरें खुद ही पोस्ट की हैं। एक तस्वीर में वे मुदित भाव से हंडिया से पखाल खा रहे हैं। सामने चार प्यालों में कुछ और व्यंजन भी रखे हुए हैं। तस्वीर से घर की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां दो वक्त का भोजन मुश्किल से जुटता होगा। फिर ये सारे पकवान रोज नहीं बनते होंगे। क्या केवल संबित पात्रा के लिए ये पकवान बने। इसके लिए उस परिवार पर कितना बोझ बढ़ा होगा। क्या उनके घर में आने वाले दिनों में इन पकवानों के बदले फाकाकशी की जाएगी, या फिर श्री पात्रा ने अपने भोजन का खर्च खुद उठाया है। क्या संबित पात्रा उस परिवार के लिए कोई भेंट, उपहार ले कर गए। इन सवालों के जवाब जानना दिलचस्प होगा।

वापस लौटते हैं तस्वीर पर। संबित पात्रा के एक ओर दो वृद्धाएं मुस्कुराती बैठी हैं, बिल्कुल आम भारतीय स्त्रियों के व्यवहार के अनुरूप, किसी को भोजन कराकर तृप्ति भाव से भरी हुई। लेकिन दूसरी ओर तीन बच्चियां बैठी हुई हैं, जो उदास नजर आ रही हैं। सबसे आगे बैठी बच्ची तिरछी नजरों से संबित पात्रा को खाते देख रही है, उसके चेहरे पर किंचित क्रोध का भाव है, मानो आज उसके हिस्से का भोजन किसी और को दे दिया गया हो। उसके पीछे बैठी बच्ची दुखी दिख रही है, जैसे वो भूखी हो या उसे जबरदस्ती इस तस्वीर का हिस्सा बनाकर बिठा दिया गया है।

तीसरी बच्ची भी संबित पात्रा को देख रही है, उसके चेहरे पर मिले-जुले भाव हैं, मानो वो इस राजनीति को समझने की कोशिश कर रही है कि किसी गरीब के घर भोजन करके ये नेता जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं। गरीबों के घर जाकर खुद पकवान खाने की जगह बेहतर है कि उस परिवार के साथ एक दिन, उनकी तरह गुजारा जाए। उनके साथ खेत में या मनरेगा की मजदूरी की जाए। जिस तरह वे खाना खाते हैं, वैसा ही खाना उनके साथ खाएं और हो सके तो महीने-दो महीने का राशन, गैस सिलेंडर के साथ दे कर आएं। मुझे नहीं पता कि संबित पात्रा का इन आदिवासियों के साथ, महिलाओं और बच्चियों के साथ किस तरह का संवाद हुआ, बच्चियों को अपने घर एक नेता का भोजन करना अच्छा लगा या नहीं, संबित पात्रा ने घर से निकलते हुए बच्चियों को कोई नेग दिया या नहीं।

लेकिन तस्वीर में जो दिख रहा है, वह बेचैन करने के लिए काफी है। आम भारतीय परिवारों में बूढ़ों और बच्चों को पहले भोजन कराया जाता है। और बच्चे साथ में बैठे हों, तो अकेले न खा कर उन्हें भी साथ खाने का आग्रह किया जाता है। संबित पात्रा तो अकेले ही खाते दिख रहे हैं। इस तस्वीर में जिन बच्चियों के चेहरे साफ तौर पर उजागर हैं, क्या वह कानूनी तौर पर सही है, क्या बच्चियों के अभिभावकों से संबित पात्रा ने इस तस्वीर को पोस्ट करने से पहले अनुमति ली, यह भी विचारणीय है।

क्योंकि यह तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित है। भारत जोड़ो यात्रा में बच्चों की मौजूदगी पर राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने राहुल गांधी को नोटिस भेज दिया था। क्या संबित पात्रा की इस तस्वीर पर आयोग कोई संज्ञान लेगा। क्या उनसे पूछा जाएगा कि आपने राजनीतिक मकसद के लिए बच्चियों का इस्तेमाल क्यों किया। क्योंकि संबित पात्रा रिश्तेदारी में तो इस आदिवासी परिवार के घर पखाल खाने नहीं पहुंचे हैं, बल्कि उनके इरादे 2024 के चुनाव से ही जुड़े दिख रहे हैं। 2019 के चुनाव में कांग्रेस और गांधी परिवार के खिलाफ निरंतर मोर्चा खोले रखने के कारण टिकट तो मिल गया था, लेकिन जीत नहीं मिल पाई थी। संबित पात्रा की राजनीति अब भी उसी दिशा में चल रही है, तो उन्हें फिर से टिकट मिलने की उम्मीद तो है, लेकिन जीत मिलेगी या नहीं इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि इस वक्त देश औऱ राजनीति के ही नहीं, भाजपा के भी कठिन दिन चल रहे हैं।

अब बात दूसरी तस्वीर की, जो कांग्रेस नेता राहुल गांधी की है। संबित पात्रा के विपरीत, राहुल गांधी चुनाव जीते हुए जननेता हैं, लेकिन अब वे संसद से घोषित तौर पर अयोग्य हैं और फिलहाल कांग्रेस में किसी पद पर भी नहीं हैं। यानी राहुल गांधी की हैसियत फिलहाल देश की सबसे पुरानी पार्टी के एक सामान्य नेता की ही है। ये अलग बात है कि उनकी राजनैतिक विरासत उन्हें आम नहीं खास नेता बना देती है, और वे अपने परिवार की गौरवशाली विरासत को बखूबी निभाते भी आए हैं।

भाजपा के लिए यह परिवारवाद ही सबसे बड़ी ग्रंथि बना हुआ है, जिससे वो मुक्त ही नहीं हो पा रही है। मंगलवार को राहुल गांधी दिल्ली के बंगाली मार्केट में आलू टिक्की, गुपचुप और फिर चांदनी चौक में तरबूज का आनंद लेते दिखाई दिए। भारत जोड़ो यात्रा की सफेद टी शर्ट अब नीली हो गई है। बंगाली मार्केट चाट-पकौड़ियों, मिठाइयों के लिए प्रसिद्ध है और खाने-पीने के शौकीनों का यहां आना कोई बड़ी बात नहीं है। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा में कर्ली टेल्स को साक्षात्कार दिया था, तब उन्होंने खाना खाते हुए ही सारी बातें की थीं और बताया था कि उन्हें क्या-क्या पसंद है।

कैमरे के सामने भी राहुल गांधी सहज भाव से ही खा-पी रहे थे। पिछले दिनों कर्नाटक में नंदिनी स्टोर की आइसक्रीम का स्वाद भी उन्होंने लिया। पहले भी वे कहीं चाय पीते, कहीं रेस्तरां में भोजन करते दिखाई दिए हैं और हर बार सहजता ही दिखी है। दरअसल जो भोजन का संबंध राजनीति से न जोड़े, वो ऐसा ही आम इंसान दिखेगा। बंगाली मार्केट में राहुल गांधी के आसपास जो लोग खड़े हैं, उनमें से कोई ललचाई नजरों से उन्हें नहीं देख रहा है। वे किसी के हक का खाते हुए नहीं दिख रहे हैं। चांदनी चौक में रमजान के दिनों में इफ्तार के वक्त वैसे ही खा-पी रहे हैं, जैसे बाजारों में लोग खाते दिखते हैं। ट्रोलर्स चाहें तो इसमें भी कोई मुद्दा निकालकर उनकी आलोचना कर लें। लेकिन देश इस तरह की तस्वीर देखने को तरस गया है, जब विशिष्ट माने जाने वाले लोग आम लोगों के बीच, उनकी तरह ही दिखाई दें।

इन दो तस्वीरों से जो अलग-अलग राजनैतिक संदेश निकले हैं, उन्हें जनता जितनी जल्दी समझ जाए, उतना अच्छा है। पहली तस्वीर तुम चुप रहो का आदेश दे रही है, दूसरी तस्वीर डरो मत का आह्वान कर रही है।

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